घंघोल
घंघोल
प्रेम
व्यक्तित्वों को नहीं जोड़ता।
वह उन्हें
घंघोल देता है।
सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।
पहचानें मिल जाती हैं
और खो भी जाती हैं।
कभी प्रेमी
कवि जैसा बोलने लगता है।
कभी कवि
पागल की तरह देखता है।
और पागल
प्रेमी की तरह प्रतीक्षा करता है।
इस घोल में
तीनों का अंतर मिट जाता है
और बचता है केवल एक बात
कि मनुष्य
अब भी
पूरी तरह गणनीय नहीं हुआ है।
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