शब्दयात्री — प्रतीक्षा
शब्दयात्री — प्रतीक्षा
इन दिनों मैं प्रतीक्षा को नए अर्थों में समझने लगा हूँ।
पहले लगता था, प्रतीक्षा का मतलब है—किसी के आने तक ठहरे रहना।
अब मालूम हुआ,
प्रतीक्षा किसी और के आने की नहीं,
अपने भीतर कुछ घटने की भी होती है।
हम सब किसी-न-किसी इंतज़ार में जीते हैं।
कोई ख़त का इंतज़ार करता है,
कोई आवाज़ का,
कोई एक मुलाक़ात का,
कोई उस एक अल्फ़ाज़ का,
जो बरसों से किसी के होंठों तक नहीं आ पाया।
लेकिन सबसे लंबी प्रतीक्षा
शायद अपनी ही होती है।
उस दिन की,
जब हम अपने भीतर लौट सकेंगे।
मैंने देखा है—
बीज कभी अधीर नहीं होता।
वह मिट्टी के अँधेरे में पड़ा रहता है,
बिना शिकायत,
बिना शोर।
उसे मालूम है कि हर ऋतु का अपना वक़्त होता है।
नदी समुद्र तक पहुँचने की जल्दी में
अपने किनारों को नहीं छोड़ती।
सुबह भी रात को धक्का देकर नहीं आती।
वह धीरे-धीरे उजाला बुनती है,
और अँधेरा ख़ुद-ब-ख़ुद विदा हो जाता है।
शायद प्रकृति इसलिए इतनी सुंदर है,
क्योंकि उसे प्रतीक्षा का सलीक़ा आता है।
सिर्फ़ हम हैं
जो हर फल को पकने से पहले तोड़ लेना चाहते हैं,
हर जवाब को समय से पहले सुन लेना चाहते हैं,
हर रिश्ते को खिलने से पहले परख लेना चाहते हैं।
फिर शिकायत करते हैं
कि मिठास क्यों नहीं मिली।
प्रतीक्षा वक़्त की बर्बादी नहीं होती।
वह वक़्त पर किया गया सबसे गहरा भरोसा होती है।
वह हमें सिखाती है
कि हर चीज़ हासिल नहीं की जाती,
कुछ चीज़ें अर्जित होती हैं।
और अर्जित होने के लिए
समय चाहिए,
सब्र चाहिए,
और ख़ामोशी चाहिए।
अब जब किसी का इंतज़ार करता हूँ,
तो सिर्फ़ उसकी राह नहीं देखता।
अपने भीतर भी देखता हूँ—
क्या मैं सचमुच उससे मिलने के लिए तैयार हूँ?
क्या मेरी रूह में इतनी जगह बची है
कि किसी और की मौजूदगी वहाँ ठहर सके?
तब लगता है,
प्रतीक्षा दरअसल किसी और के आने से पहले
अपने भीतर जगह बनाने का नाम है।
शायद इसी लिए
ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ें
अचानक नहीं मिलतीं।
वे आती हैं...
मगर तब,
जब हमारा दिल उन्हें पहचानने के क़ाबिल हो जाता है।
और तब समझ में आता है
प्रतीक्षा कभी ख़ाली नहीं जाती।
वह या तो हमें हमारा चाहा हुआ दे देती है,
या फिर
हमें इतना बदल देती है
कि जो मिलता है,
वही हमारा चाहा हुआ लगने लगता है।
मुकेश ,,,,,,,
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