विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र : भारतीय चित्रकला का विश्वकोश
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विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र : भारतीय चित्रकला का विश्वकोश
भारतीय कला के इतिहास में यदि किसी ग्रन्थ को चित्रकला का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शास्त्रीय आधार कहा जाए, तो वह विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र है। भारतीय चित्रकला की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। वैदिक साहित्य में रंग, रूप, प्रतीक और दृश्य-कल्पना के बीज मिलते हैं; अजंता, बाघ और सिगिरिया जैसे भित्तिचित्र उसकी परिपक्व कलात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। किन्तु चित्रकला के सिद्धान्तों, उद्देश्यों, विधियों और सौन्दर्यशास्त्र का व्यवस्थित प्रतिपादन जिस ग्रन्थ में मिलता है, वह चित्रसूत्र है।
चित्रसूत्र केवल चित्र बनाने की तकनीक नहीं सिखाता; वह यह भी बताता है कि चित्रकला क्या है, उसका उद्देश्य क्या है, कलाकार की भूमिका क्या है, और कला का सम्बन्ध संगीत, नृत्य, वास्तु तथा आध्यात्मिकता से कैसे है। इस दृष्टि से चित्रसूत्र केवल एक कला-ग्रन्थ नहीं, बल्कि भारतीय सौन्दर्य-दर्शन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण का परिचय
विष्णुधर्मोत्तर पुराण उपपुराणों में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। विद्वानों के अनुसार इसका वर्तमान स्वरूप लगभग पाँचवीं से सातवीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित हुआ।
यह ग्रन्थ तीन खण्डों में विभक्त है।इसके तृतीय खण्ड में कला, नृत्य, संगीत, मूर्तिकला, वास्तुकला तथा चित्रकला का अत्यन्त विस्तृत विवेचन मिलता है।
चित्रकला से सम्बन्धित अध्यायों को सामूहिक रूप से चित्रसूत्र कहा जाता है।
चित्रसूत्र की विशिष्टता
चित्रसूत्र का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि वह चित्रकला को अलग-थलग कला नहीं मानता।
ग्रन्थ में एक प्रसिद्ध विचार मिलता है— चित्रकला को समझने के लिए मूर्तिकला जाननी होगी।
मूर्तिकला को समझने के लिए नृत्य।
नृत्य को समझने के लिए संगीत।
संगीत को समझने के लिए गान।
और गान को समझने के लिए छन्द तथा भाषा।
अर्थात् कला का प्रत्येक रूप दूसरे से जुड़ा हुआ है।
आज जिसे "इंटरडिसिप्लिनरी" (Interdisciplinary) दृष्टिकोण कहा जाता है, उसका अत्यन्त विकसित स्वरूप चित्रसूत्र में दिखाई देता है।
चित्रकला की परिभाषा
चित्रसूत्र के अनुसार चित्र केवल वस्तुओं की नकल नहीं है।चित्र का उद्देश्य भाव, सौन्दर्य और जीवन को व्यक्त करना है।चित्र में केवल बाहरी रूप नहीं, बल्कि आन्तरिक चेतना भी झलकनी चाहिए।
भारतीय दृष्टि में चित्रकला यथार्थ की प्रतिलिपि नहीं, बल्कि यथार्थ का रसात्मक पुनर्सृजन है।
चित्रकला के षडंग (छः अंग)
चित्रसूत्र की सबसे प्रसिद्ध देन चित्रकला के षडंग सिद्धान्त का व्यवस्थित प्रतिपादन है।ये छह अंग भारतीय चित्रकला के मूल सिद्धान्त माने गए हैं।
1. रूपभेद
वस्तुओं और प्राणियों के विभिन्न रूपों का ज्ञान। कलाकार को यह समझना चाहिए कि मनुष्य, पशु, वृक्ष, पर्वत और देवताओं के रूपों में क्या भिन्नताएँ हैं।
2. प्रमाण -अनुपात और माप का विज्ञान।चित्र में शरीर, अंगों और आकृतियों का संतुलन अत्यन्त आवश्यक है।
3. भाव -चित्र में भावाभिव्यक्ति।चित्र केवल आकृति न रहे; उसमें जीवन और अनुभूति दिखाई दे।
4. लावण्य-योजना -सौन्दर्य की रचना। चित्र में ऐसा आकर्षण हो जो दर्शक को बाँध ले।
5. सादृश्य - वस्तु के स्वभाव और पहचान का संरक्षण। चित्रित आकृति अपने मूल चरित्र से पहचानी जा सके।
6. वर्णिका-भंग -रंगों का समुचित प्रयोग।रंगों का संतुलन, मिश्रण और प्रभाव।इन छह अंगों को भारतीय चित्रकला का आधारस्तम्भ माना गया।
रंग-दर्शन
चित्रसूत्र में रंगों का अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन मिलता है। भारतीय कलाकार रंगों को केवल दृश्य तत्त्व नहीं मानता।
रंग मनोभाव उत्पन्न करते हैं। रंग चरित्र व्यक्त करते हैं।रंग आध्यात्मिक संकेत भी देते हैं।इस प्रकार रंग का प्रयोग मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक दोनों स्तरों पर किया जाता है।
मानव शरीर का अध्ययन
चित्रसूत्र में कलाकार के लिए शरीर-विज्ञान का ज्ञान आवश्यक माना गया है। विभिन्न आयु, प्रकृति और व्यक्तित्व के लोगों के शारीरिक लक्षणों का वर्णन किया गया है। देवताओं, राजाओं, ऋषियों, स्त्रियों और सामान्य जनों के अनुपात अलग-अलग बताए गए हैं।
इससे स्पष्ट है कि भारतीय चित्रकार केवल कल्पना पर निर्भर नहीं था; वह सूक्ष्म अवलोकन भी करता था।
भाव और रस
चित्रसूत्र का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह चित्रकला को रस से जोड़ता है। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में कला का लक्ष्य रसोत्पत्ति है।
चित्र भी दर्शक के भीतर— श्रृंगार,वीर,करुण,अद्भुत,शान्त
आदि भावों को जागृत कर सकता है।
इस प्रकार चित्रकला का उद्देश्य केवल दृश्य सुख नहीं, बल्कि भावानुभूति है।
चित्रकला और संगीत का सम्बन्ध
चित्रसूत्र की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक यह है कि वह चित्रकला को संगीत और नृत्य से जोड़ता है।
यह विचार आधुनिक कला-दर्शन के लिए भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
भारतीय कलाकार के लिए— रेखा में लय है,रंग में स्वर है,संरचना में ताल है।चित्र स्थिर होते हुए भी गतिशील है।
इस दृष्टि से चित्रसूत्र भारतीय कला की समग्रता को व्यक्त करता है।
चित्रकला और आध्यात्मिकता
चित्रसूत्र में कला का सम्बन्ध धर्म और आध्यात्मिकता से भी जोड़ा गया है। देवचित्रों का निर्माण केवल सजावट के लिए नहीं किया जाता।वे ध्यान, स्मरण और आध्यात्मिक अनुभूति के साधन भी हैं।यहाँ कलाकार एक प्रकार का साधक बन जाता है। उसकी कला केवल कौशल नहीं, साधना है।
चित्रसूत्र और आधुनिक कला
चित्रसूत्र के अनेक विचार आज भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक कला-जगत में— संरचना,अनुपात,दृश्य-लय,रंग-मनोविज्ञान,अभिव्यक्ति, जिन विषयों पर चर्चा होती है, उनका प्रारम्भिक स्वरूप चित्रसूत्र में देखा जा सकता है।
विशेष रूप से कला के समेकित दृष्टिकोण की आवश्यकता आज पुनः अनुभव की जा रही है। चित्रसूत्र इस संदर्भ में अत्यन्त आधुनिक प्रतीत होता है।
सीमाएँ और पुनर्पाठ की आवश्यकता
चित्रसूत्र को समझते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने समय की सांस्कृतिक परिस्थितियों में रचा गया ग्रन्थ है। उसके अनेक निर्देश धार्मिक और राजकीय कला से सम्बद्ध हैं।
आधुनिक कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और प्रयोगधर्मिता को उसी रूप में उसमें नहीं खोजा जा सकता।किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि चित्रसूत्र अप्रासंगिक हो गया है।
वास्तव में उसके सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त आज भी अध्ययन और पुनर्व्याख्या की माँग करते हैं।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र भारतीय चित्रकला का केवल तकनीकी मार्गदर्शक नहीं, बल्कि उसका दार्शनिक संविधान है। यह ग्रन्थ बताता है कि चित्रकला केवल आकृतियों और रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि रूप, भाव, लय, अनुपात, सौन्दर्य और आध्यात्मिक चेतना का समन्वित विज्ञान है।
चित्रसूत्र की सबसे बड़ी देन यह है कि उसने कला को खण्डों में नहीं बाँटा। उसके लिए चित्रकला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और वास्तुकला एक ही सांस्कृतिक चेतना की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। यही दृष्टि भारतीय कला को उसकी विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
इस प्रकार चित्रसूत्र न केवल भारतीय चित्रकला का आधारग्रन्थ है, बल्कि यह भारतीय सौन्दर्य-दर्शन की उस समग्र परम्परा का प्रतिनिधि भी है जिसमें कला, सत्य और साधना अंततः एक ही अनुभव में विलीन हो जाते हैं।
मुकेश ,,,,
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