मेरे भीतर कई अनदेखे से जंगल

 
मेरे भीतर कई अनदेखे से जंगल

भटकते हैं मेरी आवाज़ के जंगल

किसी ने एक चिड़िया क्या उड़ा दी बस,
उदासी बो गई परवाज़ के जंगल

तुम्हारे बाद घर में कुछ नहीं बदला,
मगर उगने लगे ख़ामोश के जंगल

कभी जो बात होठों तक नहीं पहुँची,
वही बनकर खड़े हैं राज़ के जंगल

यहाँ हर शख़्स अपने आप से बिछड़ा,
यहाँ हर आँख में निर्वास के जंगल

सफ़र इतना किया कि ख़ुद को खो बैठे,
मिले आख़िर हमें आगाज़ के जंगल

न कोई राह, न मंज़िल, न कोई नक़्शा,
मगर चलते रहे अंदाज़ के जंगल

समय की धूप जब रिश्तों पे उतरी तो,
झुलसकर रह गए अल्फ़ाज़ के जंगल

कभी बैठो किसी बूढ़े की आँखों में,
वहाँ मिल जाएँगे इक उम्र के जंगल

मैं अक्सर रात को ख़ुद से मिला करता,
मेरे कमरे में हैं एहसास के जंगल।

मुकेश ,,,,,,,,,

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