यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे...” — पृथ्वी सूक्त के पंचम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

“यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे...” — पृथ्वी सूक्त के पंचम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

पृथ्वी सूक्त का पंचम मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ पृथ्वी को केवल भौतिक तत्वों, नदियों, पर्वतों अथवा वनस्पतियों की धारक के रूप में नहीं, बल्कि मानव इतिहास, संस्कृति, संघर्ष, विकास और सभ्यता की साक्षी के रूप में देखा गया है। यह मंत्र पृथ्वी के ऐतिहासिक (Historical), मानवशास्त्रीय (Anthropological) तथा सांस्कृतिक (Cultural) आयामों को उद्घाटित करता है।

यदि पूर्ववर्ती मंत्रों में पृथ्वी के प्राकृतिक स्वरूप का वर्णन था, तो यहाँ ऋषि मानव सभ्यता की ओर दृष्टि डालते हैं। पृथ्वी वह मंच है जिस पर पूर्वजों ने जीवन जिया, समाज बनाए, संस्कृतियाँ विकसित कीं और धर्म तथा अधर्म, प्रकाश और अन्धकार, व्यवस्था और अव्यवस्था के संघर्ष घटित हुए।

मंत्र-पाठ

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे ,यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्।
गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा, भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥ ५॥

जिस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजों ने कर्म किए और सभ्यताओं का निर्माण किया, जिस पर देवों ने असुरों पर विजय प्राप्त की, जो गौओं, अश्वों और पक्षियों का निवासस्थान है—वह पृथ्वी हमें ऐश्वर्य, सौभाग्य और तेज प्रदान करे।

पृथ्वी : इतिहास की जीवित पुस्तक

मंत्र का प्रारम्भ होता है— “यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे”

अर्थात् जिस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजों ने विविध कर्म किए।

यहाँ "पूर्वजन" केवल जैविक पूर्वज नहीं हैं, बल्कि वे समस्त मानव समुदाय हैं जिन्होंने पृथ्वी पर सभ्यता की नींव रखी।

ऋषि यह स्वीकार करते हैं कि वर्तमान पीढ़ी अकेले नहीं खड़ी है; उसके पीछे असंख्य पीढ़ियों का श्रम, ज्ञान और अनुभव है।

आधुनिक इतिहासशास्त्र भी यही बताता है कि प्रत्येक सभ्यता पूर्ववर्ती सभ्यताओं की उपलब्धियों पर निर्मित होती है।

आज हम जिस विज्ञान, कृषि, भाषा और संस्कृति का उपयोग करते हैं, वह हजारों वर्षों की सामूहिक मानव यात्रा का परिणाम है।

इस प्रकार यह मंत्र ऐतिहासिक चेतना (Historical Consciousness) का अत्यंत प्राचीन उदाहरण है।

पुरातत्त्व और पृथ्वी

यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पृथ्वी वास्तव में मानव इतिहास का सबसे बड़ा अभिलेखागार (Archive) है।

धरती की परतों में सुरक्षित हैं—

  • प्राचीन नगर,
  • मिट्टी के पात्र,
  • अस्थियाँ,
  • औजार,
  • अभिलेख,
  • सिक्के,
  • जीवाश्म।

आज का पुरातत्त्व-विज्ञान (Archaeology) इन्हीं के आधार पर अतीत का पुनर्निर्माण करता है।

ऋषि जब कहते हैं कि पूर्वजों ने इसी पृथ्वी पर कर्म किए, तो वे अनजाने में उस ऐतिहासिक स्मृति की ओर संकेत कर रहे हैं जिसे आधुनिक विज्ञान पृथ्वी की परतों में खोजता है।

“देवा असुरानभ्यवर्तयन्” : प्रतीकात्मक अर्थ

मंत्र का दूसरा चरण है— “यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्”

शाब्दिक अर्थ है—जिस पृथ्वी पर देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की।

वैदिक साहित्य में "देव" और "असुर" को केवल पौराणिक पात्रों के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है।

दार्शनिक दृष्टि से—

  • देव = प्रकाश, ज्ञान, व्यवस्था, सद्गुण
  • असुर = अज्ञान, अव्यवस्था, हिंसा, अराजकता

इस प्रकार यह वाक्य मानव इतिहास में सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान, सभ्यता और बर्बरता के सतत संघर्ष का प्रतीक बन जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टि : विकास का संघर्ष

आधुनिक मानवशास्त्र बताता है कि मानव सभ्यता का विकास अनेक चुनौतियों से होकर गुजरा—

  • प्राकृतिक आपदाएँ,
  • रोग,
  • अकाल,
  • युद्ध,
  • सामाजिक संघर्ष।

इन चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर ही मनुष्य ने उन्नति की।

इस अर्थ में "देवों की विजय" मानव बुद्धि, विज्ञान और संस्कृति की विजय का भी प्रतीक है।

जब मनुष्य ने—

  • अग्नि का उपयोग सीखा,
  • कृषि विकसित की,
  • चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त किया,

तब उसने प्रकृति की अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की।

जैव-विविधता का उल्लेख

मंत्र में आगे कहा गया है— “गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा”

अर्थात् यह पृथ्वी गौओं, अश्वों और पक्षियों का निवास स्थान है।

यहाँ तीन वर्गों का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—

1. गौ (Cattle) - वैदिक अर्थव्यवस्था का आधार।

2. अश्व (Horse) - गति, शक्ति और परिवहन का प्रतीक।

3. वयस् (Birds) - आकाशीय जीवन और पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक।

ऋषि यह संकेत देते हैं कि पृथ्वी केवल मनुष्य की नहीं है; वह अन्य जीवों का भी घर है।

पारिस्थितिकी की आधुनिक समझ

आज पर्यावरण विज्ञान बताता है कि किसी भी स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र में विविध प्रकार के जीवों का होना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए—

  • पक्षी बीजों का प्रसार करते हैं,
  • पशु घासभूमियों को संतुलित रखते हैं,
  • सूक्ष्मजीव मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं।

यदि जैव-विविधता नष्ट हो जाए तो सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।

ऋषि का दृष्टिकोण आश्चर्यजनक रूप से इसी आधुनिक वैज्ञानिक समझ के निकट है।

“भगं वर्चः” : समृद्धि और तेज

मंत्र के अन्त में प्रार्थना है—  “भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु”

यह पृथ्वी हमें—

  • भग (समृद्धि, सौभाग्य)
  • वर्चस् (तेज, ज्ञान, प्रतिष्ठा)

प्रदान करे।

यहाँ समृद्धि केवल आर्थिक नहीं है।

वैदिक दृष्टि में वास्तविक समृद्धि में शामिल हैं—

  • स्वास्थ्य,
  • ज्ञान,
  • नैतिक शक्ति,
  • सांस्कृतिक विकास,
  • सामाजिक संतुलन।

आज मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) भी इसी व्यापक अवधारणा की ओर बढ़ रहा है।

सांस्कृतिक पारिस्थितिकी का वैदिक दर्शन

यह मंत्र एक गहरा संदेश देता है—

पृथ्वी केवल प्रकृति का आधार नहीं, संस्कृति का भी आधार है।

उसी पर—

  • इतिहास घटित होता है,
  • सभ्यताएँ जन्म लेती हैं,
  • ज्ञान विकसित होता है,
  • संघर्ष और समाधान दोनों घटित होते हैं।

इसलिए पृथ्वी का संरक्षण केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है।

पृथ्वी सूक्त का पंचम मंत्र पृथ्वी को मानव इतिहास, सांस्कृतिक विकास और जैव-विविधता की धारक के रूप में प्रस्तुत करता है। पूर्वजों के कर्म, देव-असुर संघर्ष, पशुओं और पक्षियों का निवास तथा समृद्धि और तेज की कामना—इन सबके माध्यम से ऋषि पृथ्वी के बहुआयामी स्वरूप का दर्शन कराते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से यह मंत्र इतिहास, पुरातत्त्व, मानवशास्त्र, पारिस्थितिकी और सतत विकास की अवधारणाओं से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यह हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल संसाधन नहीं, बल्कि मानवता की सामूहिक स्मृति, संस्कृति और भविष्य की आधारशिला है।

समापन श्लोक

यत्र पूर्वैः संस्कृतो मानवलोकः, यत्र ज्ञानं तमसा संगतं जितम्।
सा धरा नो वर्चसं भाग्यमेव च,ददातु नित्यं जननीव सस्नेहम्॥

(यह व्याख्यात्मक रचना है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)

मुकेश ,,,,,,,

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