तुम्हारी देह के बाहर
तुम्हारी देह के बाहर
तुम्हारी देह के बाहर भी
तुम्हारा एक विस्तार है।
जैसे फूल के बाहर
उसकी गंध।
जैसे तारे के बाहर
उसकी रोशनी।
मैं उसी विस्तार में
अक्सर भटक जाता हूँ
और लौटकर
तुम्हें ही नहीं पहचान पाता।
मुकेश ,,,,,,,
तुम्हारी देह के बाहर
तुम्हारी देह के बाहर भी
तुम्हारा एक विस्तार है।
जैसे फूल के बाहर
उसकी गंध।
जैसे तारे के बाहर
उसकी रोशनी।
मैं उसी विस्तार में
अक्सर भटक जाता हूँ
और लौटकर
तुम्हें ही नहीं पहचान पाता।
मुकेश ,,,,,,,
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