गहराई का ठहराव
गहराई का ठहराव
वे उतरते हैं बिना किसी तारीख के,
हाथों में कोई रोशनी नहीं, सिर्फ़ ठीक करना।
समुद्र के भीतर उनके सवाल गूंजते हैं,
कभी उत्तर बनकर, कभी सिर्फ़ थपकियाँ बनकर।
तट पीछे हटते हैं जैसे व्रत का समय,
और लहरें उनके कानों में नाम थोड़ा-सा लुका देती हैं।
उनका प्रेम रिश्ता नहीं किसी सुरक्षा से,
बल्कि वह ठहराव है जहाँ सब प्रवाह अपनी उपस्थिति भूल जाते हैं।
वह जानते हैं—हर डुबकी एक किताब है,
कुछ पन्नों पर मोती हैं, कुछ पर सिर्फ़ मिट्टी।
और वे पढ़ते हैं, बिना छलकाए, बिना अफ़सोस के,
क्योंकि पढ़ना भी उनकी पूजा है, और डूबना भी उनकी आराधना।
मुकेश ,,,,
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