यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे...” — पृथ्वी सूक्त के दशम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

 यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे...” — पृथ्वी सूक्त के दशम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

पृथ्वी सूक्त का दशम मंत्र पृथ्वी के मापन, उसके विस्तार, उसके संरक्षण तथा उसके पोषणकारी स्वरूप का अत्यंत गहन वर्णन प्रस्तुत करता है। इस मंत्र में अश्विनीकुमार, विष्णु और इन्द्र का उल्लेख आता है। किंतु इसे केवल पौराणिक आख्यान के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। वैदिक साहित्य में देवता अनेक प्राकृतिक, ब्रह्माण्डीय और मानवीय शक्तियों के प्रतीक भी हैं।

यह मंत्र पृथ्वी के मापन (Measurement), अन्वेषण (Exploration), अधिवास (Habitation) तथा पोषण (Sustenance) जैसे विषयों को स्पर्श करता है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसमें भूगोल, सर्वेक्षण-विज्ञान, पृथ्वी-अध्ययन और मानव-सभ्यता के विकास से जुड़े संकेत मिलते हैं।

मंत्र-पाठ

यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे।
इन्द्रो यां चक्र आत्मनेडनामित्रां शचीपतिः।
सा नो भूमिर्वि सूजतां माता पुत्राय मे पयः॥ १०॥

जिस पृथ्वी का अश्विनीकुमारों ने मापन किया, जिस पर विष्णु ने अपने व्यापक चरण स्थापित किए, जिसे इन्द्र ने अपने निवास और कार्यक्षेत्र के रूप में सुरक्षित बनाया—वह पृथ्वी माता अपने पुत्रों के लिए दुग्ध के समान पोषण प्रदान करे।

पृथ्वी का मापन : वैज्ञानिक चेतना का प्रारम्भ

मंत्र का प्रथम वाक्य है— “यामश्विनावमिमाताम्”

अर्थात् अश्विनीकुमारों ने जिसका मापन किया।

यहाँ "मिमाताम्" धातु "मा" से बना है, जिसका अर्थ है—मापना।

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण संकेत है।

मानव सभ्यता के विकास में मापन (Measurement) की भूमिका मूलभूत रही है।

जब मनुष्य ने मापना सीखा, तभी—

  • कृषि की भूमि का निर्धारण हुआ,
  • नगरों का निर्माण हुआ,
  • वास्तुकला विकसित हुई,
  • खगोलशास्त्र का जन्म हुआ।

आधुनिक विज्ञान की आधारशिला भी मापन ही है।

इस दृष्टि से यह मंत्र हमें बताता है कि पृथ्वी को समझने का पहला कदम उसका मापन और अवलोकन है।

अश्विनीकुमार : ज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रतीक

वैदिक साहित्य में अश्विनीकुमार चिकित्सा, कौशल और त्वरित सहायता के देवता माने जाते हैं।

दार्शनिक दृष्टि से वे मानव बुद्धि की उन शक्तियों के प्रतीक हैं जो—

  • निरीक्षण करती हैं,
  • परीक्षण करती हैं,
  • समाधान खोजती हैं।

यदि आधुनिक भाषा में कहें तो वे वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी दक्षता के प्रतीक प्रतीत होते हैं।

इसलिए पृथ्वी के मापन का कार्य अश्विनों से जोड़ना अत्यन्त अर्थपूर्ण है।

“विष्णुर्यस्यां विचक्रमे” : पृथ्वी का व्यापक विस्तार

मंत्र का दूसरा भाग कहता है— “विष्णुर्यस्यां विचक्रमे”

अर्थात् जिस पृथ्वी पर विष्णु ने व्यापक रूप से विचरण किया।

वैदिक साहित्य में विष्णु के "त्रिविक्रम" का अर्थ केवल पौराणिक कथा नहीं है।

उसका एक गहरा दार्शनिक अर्थ है—

  • व्यापकता,
  • विस्तार,
  • सर्वव्यापक व्यवस्था।

वैज्ञानिक अर्थ

आज हम जानते हैं कि पृथ्वी एक विशाल ग्रह है।

उसके— महाद्वीप,महासागर,पर्वत,वन,मरुस्थल,अत्यन्त विविध और विस्तृत हैं।

मानव ने धीरे-धीरे पृथ्वी के इन भागों का अन्वेषण किया।

विष्णु का "विचक्रमे" इस वैश्विक विस्तार और उसकी खोज का प्रतीक माना जा सकता है।

इन्द्र और पृथ्वी का मानवीकरण

मंत्र में आगे कहा गया है— “इन्द्रो यां चक्र आत्मनेडनामित्राम्”

अर्थात् इन्द्र ने उसे अपने निवास और क्रियाक्षेत्र के रूप में व्यवस्थित किया।

वैदिक प्रतीकवाद में इन्द्र ऊर्जा, शक्ति और संगठन के देवता हैं।

मानव सभ्यता के विकास में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है—

  • भूमि को बसाया गया,
  • कृषि विकसित हुई,
  • नगर बने,
  • समाज संगठित हुए।

इस प्रकार इन्द्र यहाँ मानव की रचनात्मक और संगठनात्मक शक्ति का प्रतीक बन जाते हैं।

पृथ्वी : मानव सभ्यता का घर

इस मंत्र का एक गहरा अर्थ यह है कि पृथ्वी केवल प्राकृतिक वस्तु नहीं है।

वह मानव सभ्यता का घर है।

उसी पर—

  • कृषि हुई,
  • विज्ञान विकसित हुआ,
  • संस्कृति का निर्माण हुआ,
  • समाजों का विस्तार हुआ।

आधुनिक मानव भूगोल (Human Geography) भी पृथ्वी को केवल भौतिक भूभाग नहीं, बल्कि मानव क्रियाकलापों के मंच के रूप में देखता है।

“माता पुत्राय मे पयः” : पृथ्वी का मातृत्व

मंत्र का सबसे भावपूर्ण भाग है— “माता पुत्राय मे पयः”

अर्थात् माता अपने पुत्र को दूध प्रदान करे।

यहाँ पृथ्वी को माता कहा गया है और मनुष्य को उसका पुत्र।

यह वैदिक साहित्य की अत्यंत प्राचीन और गहन अवधारणा है।

ऋषि पृथ्वी को संसाधनों की वस्तु नहीं मानते, बल्कि माता के रूप में देखते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि : पृथ्वी का पोषण

यदि इस रूपक को आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझें तो पृथ्वी हमें प्रदान करती है—

  • जल,
  • अन्न,
  • खनिज,
  • ऊर्जा,
  • औषधियाँ,
  • जैव-विविधता।

इन सबके बिना मानव जीवन सम्भव नहीं है।

अर्थात् पृथ्वी वास्तव में जीवनदायिनी माता है।

सतत विकास का संदेश

माता से केवल लेना ही पुत्र का धर्म नहीं होता।

उसकी रक्षा करना भी पुत्र का कर्तव्य है।

यह मंत्र अप्रत्यक्ष रूप से हमें बताता है कि—

  • भूमि का अति-दोहन न करें,
  • जल का संरक्षण करें,
  • जैव-विविधता को बचाएँ,
  • पर्यावरण संतुलन बनाए रखें।

आधुनिक Sustainable Development का मूल भाव भी यही है।

दार्शनिक विवेचन

इस मंत्र में तीन स्तर दिखाई देते हैं—

1. ज्ञान -अश्विनों द्वारा मापन।

2. विस्तार -विष्णु द्वारा विचरण।

3. संगठन -इन्द्र द्वारा अधिवास।

इन तीनों के बाद आता है—

4. पोषण -पृथ्वी-माता का दुग्ध।

अर्थात् ज्ञान, अन्वेषण और संगठन का अंतिम उद्देश्य जीवन का पोषण है।

यही इस मंत्र का गहन दार्शनिक संदेश है।

पृथ्वी सूक्त का दशम मंत्र पृथ्वी को मापी गई, जानी गई, व्यवस्थित की गई और अंततः पोषण देने वाली माता के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें वैज्ञानिक अवलोकन, भौगोलिक अन्वेषण, सभ्यता-निर्माण और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

आधुनिक दृष्टि से यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। उसके संसाधनों का उपयोग ज्ञान और संयम के साथ किया जाना चाहिए ताकि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उसी प्रकार पोषणदायिनी बनी रहे।

समापन श्लोक

मिता ज्ञाता च विस्तीर्णा,संस्कृता मानवैः शुभा।
पुत्रान् पाययते नित्यं,धरा माता दयालुका॥

(यह व्याख्यात्मक श्लोक है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)

मुकेश ,,,,,,,,,

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