शब्दयात्री — जब तुम दूर होते हो
शब्दयात्री — जब तुम दूर होते हो
जब तुम दूर होते हो, तब मैं तुम्हें सबसे ज़्यादा महसूस करता हूँ।
यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन मोहब्बत की दुनिया में बहुत-सी बातें अजीब होकर भी सच होती हैं।
तुम्हारी मौजूदगी में मेरा ध्यान अक्सर तुम्हारी बातों, तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारी आँखों और तुम्हारे आसपास बिखरी हुई रौशनी में उलझा रहता है। मगर जब तुम दूर होते हो, तब तुम्हारे होने की तमाम परतें धीरे-धीरे खुलने लगती हैं।
तब मैं तुम्हें देखता नहीं,
महसूस करता हूँ।
तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनता,
उसकी गूँज सुनता हूँ।
तुम्हारे हाथों को नहीं छूता,
उनकी हरारत याद करता हूँ।
और यह अजीब है कि दूरी कई बार वह सब महसूस करा देती है, जो क़ुर्बत नहीं करा पाती।
जब तुम दूर होते हो, तुम्हारा ख़याल किसी ख़ुशबू की तरह मेरे आसपास फैल जाता है।
बिना किसी आहट के।
बिना किसी दस्तक के।
मैं किसी किताब का सफ़्हा पलट रहा होता हूँ, और अचानक कोई जुमला तुम्हारी याद दिला देता है।
मैं किसी सड़क से गुज़र रहा होता हूँ, और हवा का एक झोंका तुम्हारा नाम लेकर गुज़र जाता है।
मैं चाय का पहला घूँट लेता हूँ और न जाने क्यों तुम्हारी मुस्कुराहट याद आ जाती है।
तब लगता है कि तुम मुझसे दूर नहीं हो।
बस दिखाई नहीं दे रहे।
तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी भी एक तरह की मौजूदगी बन जाती है।
धीमी,
मुलायम,
और बहुत गहरी।
जब तुम दूर होते हो, तब मैं तुम्हारे बारे में नहीं सोचता।
मैं तुम्हारे साथ सोचता हूँ।
मेरे ख़यालों में तुम्हारी एक ख़ामोश शिरकत बनी रहती है।
किसी बात पर मुस्कुरा दूँ तो लगता है, तुम भी मुस्कुरा रहे हो।
किसी ख़ूबसूरत मंज़र को देखूँ तो दिल चाहता है कि तुम भी इसे देखो।
किसी उदास शाम में बैठूँ तो तुम्हारी ख़ामोशी मेरे पास आकर बैठ जाती है।
शायद मोहब्बत का सबसे नर्म रूप यही है
जब कोई दूर होकर भी हमारे भीतर अपनी जगह बनाए रखता है।
जब उसके लिए कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती।
जब याद करना भी याद करना नहीं रहता, साँस लेने जैसा स्वाभाविक हो जाता है।
अब समझ में आता है कि दूरी सिर्फ़ जिस्मों के बीच होती है।
रूहों के बीच नहीं।
रूहें न मीलों की मोहताज होती हैं, न रास्तों की।
वे तो एक ख़याल, एक याद, एक दुआ, एक आहट के सहारे भी एक-दूसरे तक पहुँच जाती हैं।
और इसलिए...
जब तुम दूर होते हो,
मैं तुम्हें ढूँढ़ता नहीं।
मैं तुम्हें महसूस करता हूँ।
अपनी साँसों की रवानी में,
शाम की ख़ामोशी में,
किसी अनकहे जज़्बे में,
और अपने दिल की उस नरम-सी जगह में,
जहाँ तुम्हारा नाम किसी दुआ की तरह रखा हुआ है।
वहाँ तुम हमेशा क़रीब रहते हो।
इतने क़रीब,
कि कई बार मुझे ख़ुद अपने और तुम्हारे दरमियान कोई फ़ासला महसूस नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,
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