तुमने अपना दुःख
तुमने अपना दुःख
खिड़की पर रख दिया।
सोचा,
थोड़ी हवा लगेगी
तो हल्का हो जाएगा।
पर दुःख वहीं पड़ा रहा।
उसका रंग भी नहीं बदला।
उसकी गंध भी नहीं।
रात भर
चाँद उसे देखता रहा
जैसे किसी पुरानी भाषा का
अनपढ़ विद्यार्थी।
सुबह मैंने
उस दुःख को छुआ।
और वह
धीरे-धीरे कहानी में बदलने लगा।
दुःख को मुक्ति
समय नहीं देता,
कोई श्रोता देता है।
मुकेश ,,,,
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