शब्दयात्री — देखना

 शब्दयात्री — देखना

इन दिनों मैं कम देखता हूँ।

या शायद पहली बार सचमुच देखना सीख रहा हूँ।

पहले आँखें सिर्फ़ चीज़ों को पहचानती थीं।

अब वे उनके भीतर ठहरे हुए वक़्त को भी देखने लगी हैं।

पहले मैं चेहरों को देखता था।

अब चेहरों पर गुज़रती हुई उम्र को देखता हूँ।

मुस्कुराहटों के पीछे छिपी हुई थकान को देखता हूँ।

आँखों की नमी में बरसों से अटके हुए मौसमों को देखता हूँ।

तब समझ में आया

देखना, आँखों का हुनर कम है,

दिल की रौशनी ज़्यादा।

जो सिर्फ़ आँखों से देखता है,

उसे दुनिया दिखाई देती है।

जो दिल से देखता है,

उसे दुनिया के भीतर छिपी हुई कहानी दिखाई देती है।

हर मंज़र अपनी ज़बान नहीं खोलता।

कुछ दृश्य ख़ामोश रहते हैं।

उन्हें पढ़ना नहीं,

महसूस करना पड़ता है।

एक सूखा हुआ पत्ता भी कभी-कभी पूरी पतझड़ की दास्तान कह देता है।

किसी पुरानी दीवार की दरारों में गुज़रे हुए बरस दिखाई देने लगते हैं।

किसी सुनसान सड़क पर शाम का उतरना,

अकेलेपन का सबसे सच्चा चित्र बन जाता है।

मैंने देखा है

नदी सिर्फ़ बहती नहीं,

अपने किनारों को उम्र भर देखती भी रहती है।

पहाड़ सिर्फ़ खड़े नहीं रहते,

वे सदियों से आसमान को देखते हुए बूढ़े होते हैं।

पेड़ हर मौसम को अपनी शाख़ों पर उतरते हुए देखते हैं,

और फिर बिना शिकायत उसे विदा कर देते हैं।

शायद इसी लिए प्रकृति में कोई उतावलापन नहीं है।

वह देखती है...

ठहरकर देखती है...

और जो ठहरकर देखता है,

उसे हर चीज़ अपने असली रूप में दिखाई देने लगती है।

अब कभी-कभी मैं ख़ुद को भी देखता हूँ।

वैसा नहीं जैसा आईना दिखाता है,

वैसा जैसा ख़ामोशी दिखाती है।

वहाँ चेहरा नहीं होता,

सिर्फ़ एक यात्री होता है

जो बरसों से अपने ही भीतर किसी रौशनी की तलाश में चल रहा है।

तब लगता है,

देखना किसी मंज़र को आँखों में भर लेना नहीं है।

देखना तो किसी दृश्य का धीरे-धीरे हमारे भीतर उतर जाना है।

और जिस दिन कोई दृश्य हमारे भीतर उतर जाता है,

उस दिन हम उसे नहीं देखते

वह हमें देखने लगता है।

मुकेश ,,,,,,,

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