पुस्तकालय
पुस्तकालय
पुस्तकालयों में
अब उतनी ही चुप्पी बची है
जितनी किसी बूढ़े पिता के पास
सलाह देने के बाद बचती है।
रैक पर रखी किताबें
एक-दूसरे को देखती हैं
जैसे बरसों से बिछड़े रिश्तेदार
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर।
कई किताबों के पन्ने
अब भी अधखुले हैं
किसी पाठक की उँगलियों की प्रतीक्षा में।
मगर शहर को जल्दी है।
उसे ज्ञान नहीं,
जानकारी चाहिए।
और जानकारी
इतनी तेज़ दौड़ रही है
कि बुद्धि
सड़क पार नहीं कर पा रही।
मुकेश ,,,,
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