शब्दयात्री : बन्द घर की खिड़की
शब्दयात्री : बन्द घर की खिड़की
मेरे भीतर एक घर है।
वह आबाद नहीं है।
उसमें कोई रहता भी नहीं।
फिर भी मैं उसे छोड़ नहीं पाया।
कई बरस पहले उसके दरवाज़े बन्द हो गए थे। दीवारों पर वक़्त की धूल जम गई, छतों पर ख़ामोशी उग आई, कमरों में सन्नाटे ने अपना बिस्तर बिछा लिया। मगर उस घर की एक खिड़की अब भी खुली है।
मैं अक्सर उसी खिड़की के पास जाकर बैठता हूँ।
यह अजीब बात है कि जिन लोगों को हम खो देते हैं, वे कभी-कभी पूरे घर से नहीं जाते। वे किसी एक खिड़की में, किसी एक कमरे में, किसी एक गन्ध में रह जाते हैं। और फिर पूरी उम्र हम उसी जगह लौट-लौटकर जाते रहते हैं।
उस खिड़की से बाहर कोई ख़ास मंज़र नहीं दिखाई देता।
न कोई पहाड़।
न कोई दरिया।
न कोई बाग़।
बस एक पुराना आसमान है।
दिन में फीका।
शाम को धुँधला।
और रात में तारों से भरा हुआ।
मैं वहाँ बैठकर अक्सर कुछ नहीं करता।
सिर्फ़ देखता हूँ।
कभी बादलों को।
कभी उड़ते हुए परिन्दों को।
कभी उस ख़ाली रास्ते को जो कहीं से आता है और कहीं चला जाता है।
पहले मुझे लगता था कि मैं किसी का इन्तज़ार कर रहा हूँ।
फिर समझ में आया कि इन्तज़ार भी एक उम्र के बाद अपना अर्थ बदल देता है।
शुरू में हम किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा करते हैं।
फिर किसी ख़बर की।
फिर किसी आवाज़ की।
और अन्त में केवल उस एहसास की, जो कभी किसी की मौजूदगी से पैदा हुआ था।
मैं अब उसी एहसास का मुंतज़िर हूँ।
कभी-कभी शाम की हवा उस खिड़की से भीतर आती है और कमरे में बिखरी हुई ख़ामोशी को हल्का-सा छू जाती है।
ऐसे लम्हों में मुझे भ्रम होता है कि अभी कोई पीछे से पुकारेगा।
अभी कोई आकर कहेगा कि यह सब एक ग़लतफ़हमी थी।
अभी कोई मुस्कुराकर इस लम्बी तन्हाई को तोड़ देगा।
लेकिन ऐसा कभी नहीं होता।
हवा चली जाती है।
परदा फिर स्थिर हो जाता है।
और कमरा अपनी पुरानी ख़ामोशी में लौट आता है।
मगर अब मुझे इससे शिकायत नहीं।
ख़ामोशी से लड़ते-लड़ते एक दिन मैंने पाया कि वह दुश्मन नहीं, हमनशीं है।
वह मेरे साथ उसी तरह बैठती है जैसे कोई पुराना दोस्त बैठता है—बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे।
हम दोनों उस खुली खिड़की से बाहर देखते रहते हैं।
वक़्त गुज़रता रहता है।
मौसम बदलते रहते हैं।
आसमान अपना रंग बदलता रहता है।
और उस सबके बीच मैं धीरे-धीरे समझने लगा हूँ कि कुछ घर रहने के लिए नहीं होते।
वे याद रखने के लिए होते हैं।
उनमें कोई लौटकर नहीं आता।
उनके बन्द दरवाज़े फिर नहीं खुलते।
लेकिन उनकी एक खिड़की हमेशा खुली रहती है,
ताकि स्मृति कभी-कभार वहाँ आकर बैठ सके,
थोड़ी देर आसमान देख सके,
और फिर चुपचाप वापस चली जाए।
मैं आज भी उस खिड़की के पास बैठा हूँ।
घर पुराना हो गया है।
दीवारें थक चुकी हैं।
रौशनी कम पड़ गई है।
लेकिन खिड़की अब भी खुली है।
शायद इसलिए कि मोहब्बत का आख़िरी रूप मिलन नहीं होता।
एक खुली हुई खिड़की होता है
जिसे हम जानते हैं कि कोई नहीं खटखटाएगा,
फिर भी हम उसे बन्द नहीं कर पाते।
मुकेश ,,,,,,,
Comments
Post a Comment