शब्दयात्री — तुम्हें छू लेना
शब्दयात्री — तुम्हें छू लेना
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि किसी को छू लेना आख़िर क्या होता है?
क्या यह सिर्फ़ इतना है कि एक हाथ दूसरे हाथ तक पहुँच जाए? कि उँगलियाँ किसी हथेली की हरारत महसूस कर लें? कि दो जिस्म एक लम्हे के लिए एक-दूसरे की क़ुर्बत में आ जाएँ?
नहीं...
अगर स्पर्श का मतलब सिर्फ़ इतना होता, तो दुनिया में इतने लोग एक-दूसरे को छूकर भी एक-दूसरे से महरूम न रहते।
धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि किसी को छू लेना उसके जिस्म तक पहुँचना नहीं, उसकी रूह तक पहुँच जाना है।
तुम्हें छू लेने की मेरी ख़्वाहिश कभी तुम्हारे हाथों तक महदूद नहीं रही। मैं तुम्हारी आँखों में ठहरी हुई उन ख़ामोशियों को छूना चाहता था, जिन्हें तुमने बरसों से अपने सीने में महफ़ूज़ रखा है। मैं तुम्हारी मुस्कुराहट के पीछे छिपी हुई उस थकान को छूना चाहता था, जो हर शाम तुम्हारे चेहरे पर उतर आती है और फिर भी किसी से अपना हाल नहीं कहती।
मैं तुम्हारे भीतर उस मुक़ाम तक पहुँचना चाहता था जहाँ तुम दुनिया की निगाहों से दूर, ख़ुद अपने साथ बैठती हो।
मुझे हमेशा लगा है कि मोहब्बत में सबसे दिलकश स्पर्श वह नहीं होता जो त्वचा पर महसूस हो।
सबसे गहरा स्पर्श वह होता है जो रूह पर उतरता है।
बिलकुल वैसे ही जैसे किसी ख़ामोश शाम तुम्हारा ख़याल मेरे भीतर उतर आए और मेरी तमाम उदासियाँ अपने आप हल्की पड़ जाएँ।
जैसे किसी पुरानी किताब के सफ़्हों से अचानक तुम्हारी ख़ुशबू उठे और मेरा दिल एक अजीब-सी नरमी से भर जाए।
जैसे किसी भीड़-भरे हुजूम में तुम्हारी मौजूदगी का एहसास मुझे अपने चारों तरफ़ एक अदृश्य अम्न की चादर-सा महसूस हो।
शायद यही स्पर्श है।
मैंने देखा है कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में इस तरह शामिल हो जाते हैं कि उनके लिए फ़ासले कोई मायने नहीं रखते।
उनकी आवाज़ एक स्पर्श बन जाती है।
उनकी याद एक स्पर्श बन जाती है।
उनका नाम तक एक स्पर्श बन जाता है।
और कभी-कभी तो उनकी ग़ैर-मौजूदगी भी हमें उसी शिद्दत से छूती है, जिस शिद्दत से उनकी मौजूदगी छुआ करती थी।
तुम्हें छू लेना शायद तुम्हारी त्वचा तक पहुँच जाना नहीं है।
तुम्हें छू लेना शायद तुम्हारी उदासी के पास चुपचाप बैठ जाना है।
तुम्हारी ख़ामोशी में छिपे हुए अनकहे अल्फ़ाज़ को सुन लेना है।
तुम्हारे ख़ौफ़ को बिना इज़हार के पहचान लेना है।
तुम्हारी तन्हाई के उस आख़िरी कोने तक पहुँच जाना है जहाँ पहुँचने की इजाज़त बहुत कम लोगों को मिलती है।
और शायद तुम्हें छू लेना यह भी है कि जब तुम टूट रही हो, तब तुम्हारे बिखरते हुए वजूद को अपनी दुआओँ में समेट लेना।
अब मुझे लगता है कि मोहब्बत में सबसे गहरे स्पर्श हाथों से नहीं होते।
वे एतमाद से होते हैं।
वे इंतिज़ार से होते हैं।
वे उस ख़ामोशी से होते हैं जिसमें दो लोग बिना कुछ कहे एक-दूसरे का हाल पढ़ लेते हैं।
वे उस अपनायत से होते हैं जिसमें कोई आपके ज़ख़्मों पर सवाल नहीं करता, सिर्फ़ उनके पास बैठा रहता है।
अगर कभी कोई मुझसे पूछे कि तुम्हें छू लेना कैसा है, तो शायद मैं कोई मुकम्मल जवाब न दे सकूँ।
मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा—
तुम्हें छू लेना वैसा है जैसे किसी लंबी बेकरारी के बाद सुकून की एक गहरी साँस मिल जाए।
जैसे तपती हुई रूह पर बारिश की पहली बूँद उतर आए।
जैसे सदियों से बंद किसी दरवाज़े की कुण्डी खुल जाए और भीतर रौशनी दाख़िल हो जाए।
जैसे किसी वीरान मस्जिद में अचानक अज़ान की सदा गूँज उठे।
जैसे किसी सूखे हुए दरख़्त की शाख़ पर बरसों बाद पहला फूल खिल जाए।
और शायद सबसे ज़्यादा...
तुम्हें छू लेना वैसा है जैसे अपनी ही रूह के किसी भूले हुए हिस्से को फिर से पा लेना।
जैसे ख़ुद से बिछड़ जाने के बरसों बाद, एक दिन ख़ुद ही से मुलाक़ात हो जाए।
और उस मुलाक़ात में मालूम हो—
कि जिसे मैं तुम्हें छू लेना समझता रहा,
दरअसल वह मोहब्बत थी,
जो तुम्हारे बहाने मेरी रूह को छू रही थी।
मुकेश ,,,,,,,
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