शब्दयात्री — जब तुम्हारे बदन की रूहानी ख़ुशबू महसूस करता हूँ

 शब्दयात्री — जब तुम्हारे बदन की रूहानी ख़ुशबू महसूस करता हूँ

जब तुम्हारे बदन की रूहानी ख़ुशबू महसूस करता हूँ, तो मुझे हमेशा यह लगता है कि ख़ुशबू सिर्फ़ फूलों में नहीं होती, कुछ लोग भी ख़ुशबू की तरह होते हैं।

वे जहाँ होते हैं, वहाँ की फ़िज़ा बदल जाती है।

और जहाँ नहीं होते, वहाँ भी उनकी महक देर तक ठहरी रहती है।

तुम्हारी ख़ुशबू को मैं किसी इत्र या किसी फूल की ख़ुशबू की तरह नहीं पहचानता। वह कुछ और है। उसमें तुम्हारे होने की आहट है, तुम्हारी रूह की नरमी है, तुम्हारी ख़ामोशियों का रंग है।

कई बार तुम मेरे पास नहीं होते, फिर भी अचानक हवा का कोई झोंका गुज़रता है और मुझे लगता है कि तुम यहीं कहीं हो। जैसे तुम्हारी मौजूदगी ने हवा में अपना कोई नर्म-सा निशान छोड़ दिया हो।

मुझे हमेशा हैरत होती है कि यादों की भी कोई ख़ुशबू होती है।

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से गुज़र जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ से पहले उनकी महक याद आती है। उनकी बातों से पहले उनका एहसास लौटता है।

शायद इसलिए कि ख़ुशबू सीधे दिल तक पहुँचती है।

उसे अल्फ़ाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।

जब तुम्हारे बदन की वह रूहानी ख़ुशबू मेरे आसपास उतरती है, तो मेरे भीतर की बेचैनियाँ धीरे-धीरे बैठने लगती हैं। जैसे किसी ने थके हुए दिन के माथे पर ठंडी हथेली रख दी हो। जैसे किसी पुरानी मस्जिद में शाम की अज़ान गूँज उठी हो और बिखरे हुए ख़याल एक जगह जमा होने लगे हों।

तब मैं तुम्हें देखता नहीं,

तुम्हें सुनता नहीं,

तुम्हें छूता भी नहीं।

फिर भी तुम्हें महसूस करता हूँ।

इतनी शिद्दत से कि फ़ासले अपना मतलब खोने लगते हैं।

मुझे लगता है कि मोहब्बत में कुछ चीज़ें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन वही सबसे ज़्यादा सच होती हैं।

जैसे दुआ।

जैसे साँस।

जैसे ख़ामोशी।

और जैसे किसी अज़ीज़ इंसान के बदन से उठती हुई वह रूहानी ख़ुशबू, जो उसके जाने के बाद भी देर तक हमारे वजूद के आसपास मँडराती रहती है।

शायद इसी लिए जब कभी तुम्हारी ख़ुशबू का एहसास मेरे भीतर उतरता है, तो मुझे लगता है कि तुम मुझसे दूर नहीं हो।

तुम हवा में नहीं,

मेरी रूह के किसी क़रीबी कोने में ठहरे हुए हो

एक दुआ की तरह,

एक सुकून की तरह,

एक ऐसी महक की तरह,

जिसे महसूस तो किया जा सकता है,

मगर अल्फ़ाज़ में पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता।

मुकेश ,

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