शब्दयात्री — ठहरना
शब्दयात्री — ठहरना
इन दिनों मुझे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं रहती।
अजीब-सी बात है
जितनी जल्दी कम हुई है,
उतना ही रास्ता खुलने लगा है।
पहले मैं हर सफ़र को मंज़िल तक पहुँचने के लिए तय करता था।
अब रास्ते में ठहरने के लिए चलता हूँ।
कभी किसी पेड़ की छाँव के नीचे,
कभी किसी नदी के किनारे,
कभी किसी पुरानी इमारत की ख़ामोशी में,
और कभी अपने ही भीतर।
तब समझ में आया—
ठहरना, रुक जाना नहीं होता।
ठहरना तो वक़्त के साथ एक ही साँस में बैठ जाना है।
बहती हुई नदी भी ठहरती है।
हर मोड़ पर एक पल के लिए अपना चेहरा देखती है,
फिर आगे बढ़ जाती है।
डूबता हुआ सूरज भी ठहरता है।
क्षितिज पर कुछ लम्हे अपनी आख़िरी रौशनी रखकर ही रात के हवाले होता है।
हवा भी ठहरती है।
किसी पत्ते पर,
किसी फूल की ख़ुशबू में,
किसी बच्चे की हँसी में।
प्रकृति जानती है—
बिना ठहरे कोई सफ़र मुकम्मल नहीं होता।
सिर्फ़ इंसान है
जो भागते-भागते यह भूल गया है कि
रास्ते सिर्फ़ चलने के लिए नहीं होते,
जीने के लिए भी होते हैं।
मैंने देखा है
जो लोग हर वक़्त दौड़ते रहते हैं,
वे अक्सर अपने ही दिल से बिछड़ जाते हैं।
और जो कभी-कभार ठहर जाते हैं,
उन्हें अपने भीतर किसी की धीमी-सी दस्तक सुनाई देने लगती है।
अब जब भी थक जाता हूँ,
मैं किसी जगह नहीं,
किसी पल में ठहर जाता हूँ।
आँखें बंद करता हूँ,
साँसों को अपने हाल पर छोड़ देता हूँ,
और महसूस करता हूँ—
मेरे भीतर भी एक नदी है,
जो बरसों से बिना रुके बह रही थी।
ठहरने पर पहली बार उसकी आवाज़ सुनाई देती है।
तब समझ में आता है—
ठहरना वक़्त को रोकना नहीं,
अपने बिखरे हुए वजूद को फिर से एक जगह इकट्ठा करना है।
शायद ज़िंदगी की सबसे बड़ी नेमत यही है
कि हर सफ़र के बीच
हमें कुछ ऐसे लम्हे मिल जाते हैं,
जहाँ दुनिया आगे बढ़ती रहती है,
और हम...
अपने भीतर लौट आते हैं।
मुकेश ,,,,,,,
Comments
Post a Comment