समाचार
समाचार
समाचारों ने
सच्चाई से तलाक़ ले लिया है।
अब वे
हर शाम
नये वस्त्र पहनकर आते हैं
और चीख़ने लगते हैं।
एक किसान की चुप्पी
कहीं खबर नहीं बनती।
एक मज़दूर का पसीना
किसी बहस का विषय नहीं।
पर एक झूठ
यदि पर्याप्त शोर करे
तो मुख्य शीर्षक बन जाता है।
सच
अब भी वहीं बैठा है
पुराने बरगद के नीचे
अपनी बारी की प्रतीक्षा में।
उसे मालूम है
कैमरे कभी उसकी ओर नहीं मुड़ेंगे।
मुकेश ,,,,
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