शब्दयात्री : तुरीयातीत

 शब्दयात्री : तुरीयातीत

एक समय था जब मैं उसे याद करता था।

फिर एक समय आया जब मैं उसे भूलने की कोशिश करता था।

और अब एक समय है जब न याद करने का प्रयत्न है, न भूलने का।

वह मेरे भीतर वैसे ही उपस्थित है जैसे साँझ के बाद आकाश में अन्धकार उपस्थित होता है—न उसे बुलाना पड़ता है, न हटाना।

शायद यही वह जगह है जहाँ स्मृति अपने सबसे शांत रूप में पहुँचती है।

मैंने उपनिषदों में पढ़ा था कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के पार भी एक अवस्था है—तुरीय। और कुछ साधकों ने उसके भी आगे एक शब्द रखा—तुरीयातीत

वह अवस्था जहाँ नाम और रूप का आकर्षण समाप्त हो जाता है।

जहाँ अनुभव बचता है, अनुभव करने वाला नहीं।

जहाँ नदी भी नहीं रहती, किनारे भी नहीं रहते, केवल जल का सत्य रह जाता है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी स्मृति भी अब उसी दिशा में चल पड़ी है।

पहले उसकी आँखें याद आती थीं।

फिर उसकी आवाज़।

फिर उसके साथ बिताए हुए दिन।

फिर वे भावनाएँ जो उसके साथ जुड़ी थीं।

अब इनमें से कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

लेकिन एक शान्ति बची हुई है।

एक उजाला।

एक करुणा।

एक मधुर विषाद।

मैं नहीं जानता वह उससे आया था या मेरे भीतर पहले से था और उसकी उपस्थिति ने उसे जागृत कर दिया।

अब यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण नहीं लगता।

समन्दर में बहुत दूर निकल आने के बाद नाविक यह नहीं पूछता कि पहली लहर कहाँ से उठी थी।

वह केवल जल को देखता है।

और जल को देखते-देखते स्वयं जल का हिस्सा होने लगता है।

मैं भी शायद अब उसी मुक़ाम पर हूँ।

उसके जाने का दुःख बहुत पहले थक चुका है।

प्रतीक्षा भी अब एक शांत वृक्ष की तरह खड़ी है।

प्रश्नों ने बोलना छोड़ दिया है।

उत्तर आने बन्द हो गए हैं।

और उनके बीच जो रिक्तता बची है, उसमें एक अजीब प्रकार का सुकून उतर आया है।

कभी मैं सोचता था कि प्रेम का चरम मिलन है।

फिर लगा कि विरह है।

अब लगता है कि दोनों नहीं।

प्रेम का चरम शायद वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति स्मृति से भी मुक्त नहीं होता, और स्मृति के बन्धन में भी नहीं रहता।

जहाँ वह उसे अपने भीतर रखता है, लेकिन पकड़े नहीं रहता।

जैसे हथेली पर रखी हुई धूप।

जैसे जल पर पड़ी हुई चाँदनी।

जैसे आकाश में तैरती हुई कोई निहारिका।

उस रात मैं देर तक आसमान देखता रहा।

न तारे गिने।

न कोई नाम लिया।

न कोई प्रार्थना की।

बस देखता रहा।

धीरे-धीरे ऐसा लगा कि आकाश बाहर नहीं, भीतर फैल रहा है।

तारे मेरे ऊपर नहीं, मेरे भीतर चमक रहे हैं।

समन्दर बाहर नहीं, मेरे हृदय में लहरा रहा है।

और वह—

जिसे मैंने कभी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपस्थिति और सबसे बड़ी अनुपस्थिति माना था

वह भी अब किसी व्यक्ति की तरह नहीं रही।

वह एक भाव बन गई है।

एक सूक्ष्म प्रकाश।

एक अनाम स्पन्दन।

कुछ ऐसा जिसे छुआ नहीं जा सकता, पर जो हर स्पर्श में मौजूद है।

शायद यही तुरीयातीत है।

जहाँ स्मृति स्मृति नहीं रहती।

प्रेम प्रेम नहीं रहता।

और व्यक्ति व्यक्ति नहीं रहता।

सब कुछ अपने नामों से मुक्त होकर केवल अस्तित्व बन जाता है।

उस शान्ति में बैठा मैं देर तक मुस्कुराता रहा।

क्योंकि पहली बार मुझे लगा कि मैंने उसे खोया भी नहीं,

और पाया भी नहीं।

वह बस उसी तरह है—

जैसे आकाश है।

जैसे प्रकाश है।

जैसे मौन है।

और शायद जैसे आत्मा है।

— मुकेश

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