शब्दयात्री : उजड़े हुए बाग़ का माली

 शब्दयात्री : उजड़े हुए बाग़ का माली

मेरे भीतर एक बाग़ है।

कभी वह बहुत हरा-भरा रहा होगा।

यह बात मुझे फूलों से नहीं, सूखी टहनियों से पता चलती है।

क्योंकि जो चीज़ कभी जीवित नहीं रही, वह सूखती भी नहीं।

उस बाग़ में अब कोई रंग नहीं खिलता। मौसम आते हैं, गुज़र जाते हैं, हवाएँ अपने क़दमों के निशान छोड़ती हुई चली जाती हैं। पर मैं आज भी वहाँ जाता हूँ। एक बूढ़े माली की तरह।

अजीब बात है कि मैं अब भी पौधों को पानी देता हूँ।

हालाँकि मुझे मालूम है कि उनमें से ज़्यादातर बहुत पहले मर चुके हैं।

लेकिन मोहब्बत का रिश्ता अक्सर नतीजों से नहीं, आदतों से बना होता है।

मैं पानी देता हूँ।

मिट्टी को उलटता-पलटता हूँ।

सूखे पत्ते समेटता हूँ।

और फिर किसी पुराने पेड़ के नीचे बैठ जाता हूँ।

वह पेड़ उसी का लगाया हुआ है।

नहीं, उसने सचमुच कोई पेड़ नहीं लगाया था।

मगर कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में ऐसे दाख़िल होते हैं कि उनके जाने के बाद भी उनके लगाए हुए मौसम बचे रहते हैं।

वह भी अपने पीछे एक मौसम छोड़ गई थी।

शुरू-शुरू में मुझे लगता था कि एक दिन वह लौटेगी और यह बाग़ फिर से आबाद हो जाएगा।

फिर बरस बीत गए।

इन्तज़ार धीरे-धीरे उम्मीद से उतरकर आदत में बदल गया।

और आदत फिर ख़ामोशी में।

अब मैं उसकी राह नहीं देखता।

मैं सिर्फ़ उस बाग़ की देखभाल करता हूँ जो उसके जाने के बाद उजड़ गया था।

कभी-कभी किसी सूखी शाख़ पर एक नन्ही-सी कोंपल दिखाई देती है।

वह कोई नई मोहब्बत नहीं होती।

वह कोई नया सपना भी नहीं होता।

वह केवल यह याद दिलाती है कि रूह पूरी तरह बंजर नहीं हुई।

उसमें अब भी जीवन का कोई महीन-सा बीज छिपा हुआ है।

ऐसे लम्हों में मुझे उसकी याद नहीं आती।

बल्कि वह एहसास आता है जो उसकी मौजूदगी में हुआ करता था।

जैसे धूप को याद न किया जाए, केवल उसके ताप को महसूस किया जाए।

जैसे बारिश का दृश्य भूल जाएँ, मगर मिट्टी की ख़ुश्बू बची रहे।

साँझ के वक़्त जब बाग़ पर धुँधलका उतरता है, मैं अक्सर एक टूटी हुई बेंच पर बैठ जाता हूँ।

चारों तरफ़ सन्नाटा होता है।

कहीं कोई परिन्दा नहीं।

कहीं कोई फूल नहीं।

फिर भी मुझे वह जगह वीरान नहीं लगती।

क्योंकि कुछ अनुपस्थितियाँ भी पेड़ों की तरह होती हैं।

वे दिखाई नहीं देतीं, मगर अपनी छाया छोड़ जाती हैं।

और आदमी बरसों उस छाया में बैठा रहता है।

अब मुझे लगता है कि मैं उस बाग़ का मालिक नहीं हूँ।

मैं केवल उसका माली हूँ।

मालिक शायद वक़्त है।

या स्मृति।

या वह, जो बिना कोई वजह बताए चली गई थी।

मेरा काम केवल इतना है कि इस उजड़े हुए बाग़ को पूरी तरह मरने न दूँ।

कहीं कोई पगडंडी बची रहे।

कहीं कोई पेड़ खड़ा रहे।

कहीं कोई पत्ता हवा से बात करता रहे।

ताकि यदि कभी किसी बहुत दूर की शाम में उसकी स्मृति लौटकर यहाँ आए, तो उसे यह महसूस न हो कि उसके जाने के बाद सब कुछ ख़त्म हो गया था।

उसे मालूम हो

कोई था,

जो बरसों तक

एक उजड़े हुए बाग़ में

पानी देता रहा।

मुकेश ,,,,,,,


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