भैरव-संग्राम
भैरव-संग्राम
वे समुद्र में नहीं जाते शांति के लिए,
न ही मृत्यु की पर्ची लेने; वे आते हैं लड़ने।
उनका प्रेम तलवार जैसा तेज़, लेकिन कंधे पर शिखा है,
नाचते हुए काटते हैं, और काटते हुए सुलझाते हैं।
तूफ़ान उनके नाम से मिलते हैं, जहाज़ उनके कदमों के निशान छोड़ जाते हैं,
और गहरे पानी में उनका ग़ुस्सा गीत बनकर तैरता है।
वे गीत नहीं गुनगुनाते — गीत उनके से पूछते हैं,
और जब गीत टूटते हैं, वे अपनी हँसी में उनका पुनर्निर्माण करते हैं।
यह प्रेम जीतने का खेल नहीं, यह युद्ध का अनुष्ठान है,
पर एक ऐसे युद्ध का जहाँ दोनों साथी खड़े होकर झुकते हैं।
वे चल पड़े—न कि मौत को झेलने के लिए;
बल्कि जीवन को जाल में पकड़कर, उसे आग में नाचने के लिए।
मुकेश ,,,,
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