यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्याम्…” — पृथ्वी सूक्त के त्रयोदश मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
“यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्याम्…” — पृथ्वी सूक्त के त्रयोदश मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी
सूक्त का त्रयोदश मंत्र
पृथ्वी को केवल प्राकृतिक
संसाधनों की धारिणी के
रूप में नहीं, बल्कि
मानव सभ्यता, ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की आधारभूमि के रूप में
प्रस्तुत करता है। यदि
पूर्ववर्ती मंत्रों में पृथ्वी के
पर्वत, वन, जल, औषधियाँ
और जीवनदायिनी शक्ति का वर्णन था,
तो इस मंत्र में
पृथ्वी को यज्ञ, वेदी, ध्वनि, ज्ञान और सांस्कृतिक विकास का केन्द्र माना
गया है।
आधुनिक
विज्ञान के संदर्भ में
यह मंत्र विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि
यह दर्शाता है कि मानव
सभ्यता का प्रत्येक वैज्ञानिक,
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास
पृथ्वी पर ही सम्भव
हुआ है। पृथ्वी केवल
जैविक जीवन की जननी
नहीं, बल्कि मानव ज्ञान (Human Knowledge
System) की भी जननी है।
मंत्र-पाठ
यस्यां
वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माणः।
यस्यां मीयन्ते स्वरवः पृथिव्याम् ऊर्ध्वाः शुक्रा आहुतयः पुरस्तात्।
सा नो भूमिर्वर्धयद्वर्धमाना॥ १३॥
जिस
पृथ्वी पर यज्ञ-वेदियाँ
निर्मित होती हैं, जिस
पर कर्मशील मनुष्य यज्ञ और लोककल्याण
के कार्य सम्पन्न करते हैं, जिस
पर मन्त्रों की ध्वनियाँ गूँजती
हैं और जहाँ से
अग्नि की आहुतियाँ ऊपर
उठती हैं—वह निरन्तर
विकसित होने वाली पृथ्वी
हमारा भी विकास और
कल्याण करे।
पृथ्वी
: सभ्यता की प्रयोगशाला
मंत्र
का प्रारम्भ होता है— “यस्यां
वेदिं परिगृह्णन्ति”
अर्थात्
जिस पृथ्वी पर वेदी का
निर्माण किया जाता है।
वैदिक युग में वेदी केवल
धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं
थी।
वह—
ज्ञान का केन्द्र, सामाजिक
संवाद का मंच, शिक्षा
का स्थान, वैज्ञानिक अवलोकन का केन्द्र, भी
थी।
अनेक
इतिहासकार मानते हैं कि वैदिक
यज्ञों के माध्यम से—
गणित, ज्यामिति, खगोलशास्त्र, कालगणना का भी विकास हुआ।
विशेषकर
शुल्बसूत्रों में वेदी-निर्माण
के लिए विकसित ज्यामितीय
सिद्धान्त इसका प्रमाण हैं।
अतः
"वेदी" मानव ज्ञान-विकास
की आधारशिला का भी प्रतीक
है।
“यज्ञं
तन्वते विश्वकर्माणः” : यज्ञ का वैज्ञानिक अर्थ
यह मंत्र कहता है— “यज्ञं
तन्वते विश्वकर्माणः”
यहाँ
"विश्वकर्माणः"
का अर्थ है— सृजनशील
मनुष्य, कर्मयोगी, निर्माता, समाज के रचनाकार।
यज्ञ
का अर्थ केवल अग्नि
में आहुति देना नहीं है।
वैदिक
दर्शन में यज्ञ का
व्यापक अर्थ है—
ऐसा
प्रत्येक कर्म जो व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर सामूहिक कल्याण के लिए किया जाए।
आधुनिक
समाज में— वैज्ञानिक अनुसंधान,
चिकित्सा सेवा, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण,कृषि,तकनीकी नवाचार,
भी एक प्रकार के
यज्ञ हैं।
इस प्रकार ऋषि का यज्ञ-दर्शन सामाजिक उत्तरदायित्व का दर्शन है।
पृथ्वी
: समस्त सृजन का आधार
विश्वकर्मा
पृथ्वी पर यज्ञ करते
हैं।
अर्थात्—
मानव की समस्त रचनात्मक
गतिविधियाँ पृथ्वी पर ही सम्पन्न
होती हैं।
आज
की भाषा में— प्रयोगशालाएँ,
विश्वविद्यालय, वेधशालाएँ,अनुसंधान संस्थान,उद्योग,
सभी
पृथ्वी पर ही स्थित
हैं।
पृथ्वी
मानव ज्ञान की वास्तविक प्रयोगशाला
है।
“यस्यां
मीयन्ते स्वरवः” : ध्वनि और संचार
मंत्र
का अगला भाग अत्यन्त
रोचक है— “यस्यां मीयन्ते स्वरवः”
अर्थात्
जिस पृथ्वी पर स्वर (ध्वनियाँ)
गूँजती हैं। यहाँ "स्वर" केवल वैदिक मन्त्रों
का उच्चारण नहीं है। यह सम्पूर्ण
ध्वनि-जगत् का प्रतीक
है।
आधुनिक
विज्ञान
ध्वनि-विज्ञान (Acoustics) बताता है कि—ध्वनि
एक यांत्रिक तरंग (Mechanical Wave) है जो किसी
माध्यम में संचरित होती
है।
मनुष्य
की भाषा, संगीत, संवाद और शिक्षा—सब
ध्वनि पर आधारित हैं।
यदि
ध्वनि न होती—
- भाषा का विकास नहीं होता,
- ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं होता,
- सभ्यता का विकास सम्भव नहीं होता।
ऋषि
ध्वनि को सभ्यता के
मूल तत्त्व के रूप में
देखते हैं।
“ऊर्ध्वाः
शुक्राः आहुतयः” : ऊर्जा का रूपान्तरण
मंत्र
कहता है— “ऊर्ध्वाः शुक्राः आहुतयः पुरस्तात्”
अर्थात्
आहुतियाँ प्रकाशमान होकर ऊपर उठती
हैं। यहाँ अग्नि का अत्यन्त वैज्ञानिक
प्रतीक मिलता है।
जब
आहुति अग्नि में दी जाती
है, तब— ऊष्मा उत्पन्न
होती है, प्रकाश उत्पन्न
होता है, पदार्थ का
रूपान्तरण होता है।
आधुनिक
रसायन विज्ञान इसे Combustion अर्थात् दहन की प्रक्रिया
कहता है।
इस प्रक्रिया में पदार्थ ऊर्जा
में परिवर्तित होता है। ऋषि ने
इस परिवर्तन को "ऊर्ध्वा शुक्रा आहुतयः" के रूप में
देखा।
यह केवल धार्मिक कर्मकाण्ड
नहीं, बल्कि पदार्थ और ऊर्जा के
रूपान्तरण का प्रतीक भी
है।
यज्ञ
और पर्यावरण
आज यह प्रश्न उठता
है कि क्या यज्ञ
का पर्यावरण से सम्बन्ध है?
वैदिक
दृष्टि में यज्ञ का
मूल उद्देश्य था— प्रकृति के
प्रति कृतज्ञता, संसाधनों का संतुलित उपयोग,सामूहिक सहयोग,जीवन-चक्र का
सम्मान।
अतः
यज्ञ का वास्तविक अर्थ
पर्यावरण का संरक्षण है,
न कि उसका दोहन।
यदि
मनुष्य केवल लेता रहे
और प्रकृति को लौटाए नहीं,
तो यज्ञचक्र टूट जाता है।
आधुनिक
Circular Economy और
Sustainability भी
इसी संतुलन पर आधारित हैं।
“सा
नो भूमिर्वर्धयद्वर्धमाना” : विकास का वैदिक सिद्धान्त
मंत्र
का अन्त अत्यन्त प्रेरक
है— “सा नो भूमिर्वर्धयद्वर्धमाना।”
अर्थात्—
जो पृथ्वी स्वयं निरन्तर विकसित हो रही है,
वह हमारा भी विकास करे।
यहाँ "वृद्धि"
का अर्थ केवल आर्थिक
उन्नति नहीं है।
वैदिक
दृष्टि में वास्तविक विकास
है— ज्ञान की वृद्धि,स्वास्थ्य
की वृद्धि,नैतिकता की वृद्धि,पर्यावरण
की समृद्धि,सांस्कृतिक उत्कर्ष।
आधुनिक
Human Development की
अवधारणा भी इसी व्यापक
दृष्टिकोण की ओर अग्रसर
है।
वैज्ञानिक
परिप्रेक्ष्य
यदि
इस मंत्र को आधुनिक विज्ञान
के आलोक में देखें,
तो इसमें अनेक वैज्ञानिक अवधारणाएँ
समाहित हैं—
|
वैदिक
अवधारणा |
आधुनिक
वैज्ञानिक समानता |
|
वेदी |
वैज्ञानिक
प्रयोग एवं संरचित ज्ञान-प्रणाली |
|
यज्ञ |
सामाजिक
सहयोग, सतत विकास, प्रणालीगत संतुलन |
|
विश्वकर्माणः |
वैज्ञानिक,
अभियंता, शोधकर्ता, सृजनकर्ता |
|
स्वर |
ध्वनि-विज्ञान (Acoustics), संचार-विज्ञान |
|
ऊर्ध्वाः
आहुतयः |
दहन,
ऊर्जा रूपान्तरण, ऊष्मागतिकी |
|
वर्धमाना
पृथ्वी |
सतत
विकास (Sustainable
Development) |
पृथ्वी
सूक्त का त्रयोदश मंत्र
यह उद्घोष करता है कि
पृथ्वी केवल जीवन की
जननी नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की
भी आधारशिला है। वेदी, यज्ञ,
स्वर और आहुति—ये
सभी प्रतीक मानव के रचनात्मक,
वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास
के द्योतक हैं। इस दृष्टि
से यह मंत्र पृथ्वी
को मानव सभ्यता की
महान प्रयोगशाला के रूप में
प्रतिष्ठित करता है।
आधुनिक
युग में जब विकास
को केवल आर्थिक प्रगति
तक सीमित कर दिया जाता
है, तब यह वैदिक
मंत्र स्मरण कराता है कि वास्तविक
विकास वही है जिसमें
ज्ञान, प्रकृति, समाज और संस्कृति—चारों का संतुलित उत्कर्ष हो। यही पृथ्वी
सूक्त का सार्वकालिक संदेश
है।
समापन
श्लोक
यज्ञभूमिर्ज्ञानभूमिः
संस्कृतेः परमालयः।
वर्धमाना धरा नित्यं, वर्धयेदस्मदीं प्रजाम्॥
(यह
समापन श्लोक व्याख्यात्मक रचना है; यह मूल वैदिक मंत्र नहीं है।)
मुकेश
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