शब्दयात्री — साक्षीभाव
शब्दयात्री — साक्षीभाव
इन दिनों मैंने अपने भीतर एक अजीब-सी जगह खोज ली है। वह कोई स्थान नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भावना भी नहीं। वह बस एक उपस्थिति है, जो चुपचाप सब कुछ देखती रहती है। पहले मुझे उसका पता नहीं था। मैं जो कुछ भी महसूस करता था, वही बन जाता था। दुःख आता तो लगता, मैं ही दुःख हूँ। क्रोध उठता तो मैं उसी की आग में जलने लगता। प्रसन्नता आती तो उसी के साथ बह निकलता। हर अनुभव मेरी पहचान बन जाता था। मुझे कभी यह ख़याल ही नहीं आया कि अनुभव और अनुभव करने वाले के बीच भी कोई दूरी हो सकती है।
धीरे-धीरे जीवन ने सिखाया कि भीतर एक ऐसा भी बिंदु है, जहाँ न कोई हलचल पहुँचती है, न कोई शोर। वहाँ बैठकर यदि अपने ही मन को देखा जाए, तो पता चलता है कि विचार बिना बुलाए आते हैं और बिना विदा लिए चले जाते हैं। भावनाएँ भी मौसमों की तरह आती-जाती रहती हैं। कभी भीतर धूप उतरती है, कभी बादल घिर आते हैं, कभी बरसात होती है और कभी सब कुछ सूना-सूना लगता है। लेकिन इन सबके बीच कोई है जो न धूप होता है, न बादल, न वर्षा। वह केवल देखता है।
शायद यही साक्षीभाव है।
साक्षीभाव का अर्थ जीवन से दूर हो जाना नहीं है। यह संवेदनहीन हो जाना भी नहीं है। यह तो जीवन को पहले से कहीं अधिक गहराई से जीने की कला है। अंतर केवल इतना है कि अब हम हर अनुभव में डूबते नहीं, उसे घटते हुए देखते हैं। जैसे कोई नदी किनारे बैठकर जल का बहना देखता है। वह जल को रोकता नहीं, उसकी दिशा बदलने की कोशिश नहीं करता। वह केवल देखता है कि जल बह रहा है। ठीक वैसे ही मन के भीतर विचार बहते रहते हैं, स्मृतियाँ उठती रहती हैं, इच्छाएँ जन्म लेती हैं, भय अपना चेहरा दिखाता है, अहंकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। साक्षी इन सबको पहचानता है, लेकिन इनमें से किसी का कैदी नहीं बनता।
मैंने अक्सर आकाश को देखा है। उसके नीचे कितने ही मौसम बदलते रहते हैं। कभी काले बादल उसे ढँक लेते हैं, कभी इंद्रधनुष उसकी देह पर रंग भर देता है, कभी पक्षियों के झुंड उसे चीरते हुए निकल जाते हैं और कभी रात उसके माथे पर असंख्य तारे टाँक देती है। लेकिन आकाश इनमें से किसी का हिस्सा नहीं बनता। वह सबको अपने भीतर जगह देता है, फिर भी सबसे मुक्त रहता है। शायद मनुष्य के भीतर भी ऐसा ही एक आकाश है, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं।
जीवन की अधिकांश पीड़ाएँ घटनाओं से नहीं, उनसे बनी हमारी पहचान से जन्म लेती हैं। हम कहते हैं—मैं दुखी हूँ, मैं क्रोधित हूँ, मैं असफल हूँ, मैं अपमानित हूँ। धीरे-धीरे ये वाक्य हमारी पहचान बन जाते हैं। जबकि सत्य शायद इतना भर है कि इस क्षण दुःख उपस्थित है, इस क्षण क्रोध उपस्थित है, इस क्षण अपमान का अनुभव हो रहा है। अनुभव बदलते रहते हैं; देखने वाला नहीं बदलता। जब यह भेद स्पष्ट होने लगता है, तभी भीतर एक अनकही शांति उतरती है।
अब कभी-कभी मैं अपने ही विचारों को ऐसे देखता हूँ, जैसे किसी और की बातचीत सुन रहा हूँ। उन्हें रोकने की कोशिश नहीं करता। उनसे बहस भी नहीं करता। बस उन्हें आने देता हूँ, ठहरने देता हूँ और फिर चुपचाप विदा होते हुए देखता हूँ। आश्चर्य होता है कि जिन्हें मैं कभी अपना सत्य समझता था, वे तो क्षणिक लहरों की तरह आते-जाते रहते हैं। स्थायी यदि कुछ है, तो केवल वह मौन उपस्थिति जो सब कुछ देख रही है।
शायद मनुष्य की सबसे बड़ी स्वतंत्रता इसी में छिपी है कि वह अपने अनुभवों का स्वामी बनने की कोशिश न करे, बल्कि उनका साक्षी बन जाए। क्योंकि जो साक्षी हो जाता है, उसके भीतर स्वीकार जन्म लेता है। जहाँ स्वीकार होता है, वहाँ संघर्ष कम होने लगता है। और जहाँ संघर्ष समाप्त होने लगता है, वहीं से शांति की यात्रा आरम्भ होती है।
अब मुझे लगता है कि साक्षीभाव कोई दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीने का एक ढंग है। यह स्वयं से भागना नहीं, स्वयं के सबसे निकट आ जाना है। जब भीतर का साक्षी जागता है, तब जीवन वैसा ही रहता है—सुख भी आता है, दुःख भी; मिलन भी होता है, बिछोह भी; सफलता भी मिलती है, असफलता भी। बदलता केवल इतना है कि अब इन सबके बीच कोई ऐसा है, जो चुपचाप मुस्कुराते हुए सब कुछ देख रहा है।
शायद वही हमारा सबसे सच्चा स्वरूप है।
यह संस्करण आपकी "शब्दयात्री" श्रृंखला के लिए अधिक उपयुक्त है क्योंकि इसमें कविता की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि विचार की स्वाभाविक धारा है। इसे पढ़ते समय पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो लेखक अपने जीवन का निष्कर्ष नहीं सुना रहा, बल्कि उसके साथ बैठकर एक शांत संवाद कर रहा हो।
मुकेश ,,,,,,,
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