तुमने हँसना चाहा।
तुमने हँसना चाहा।
होठ खुले।
दाँतों पर धूप उतरी।
गालों में
दो छोटे-से उजाले बने।
पर हँसी
अपने पूरे आकार में नहीं आई।
बीच रास्ते से लौट गई।
जैसे किसी यात्री को
अचानक याद आ गया हो
कि उसका घर पीछे छूट गया है।
मैंने दूर से तुम्हें याद किया
और तुम्हारी हँसी ने
अपना शेष सफ़र पूरा किया।
मुकेश ,,,,
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