“यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं...” — पृथ्वी सूक्त के सप्तम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

 “यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं...” — पृथ्वी सूक्त के सप्तम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

पृथ्वी सूक्त का यह मंत्र पृथ्वी को केवल भौतिक ग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवनदायिनी व्यवस्था के रूप में देखता है जिसकी रक्षा निरन्तर होती रहती है। इस मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी की सुरक्षा, उसकी उदारता तथा उसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले पोषण और तेजस्विता का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है।

यदि आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहें तो यह मंत्र पृथ्वी की स्व-नियामक प्रणाली (Self-regulating System), पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) तथा जीवन-समर्थन तंत्र (Life-support System) की ओर संकेत करता है।

मंत्र-पाठ

यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं,देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्।
सा नो मधु प्रियं दुहामथो,उक्षतु वर्चसा॥ ७॥

पदान्वय एवं भावार्थ

जिस पृथ्वी की जागरूक, कभी न सोने वाली तथा प्रमादरहित देवशक्तियाँ रक्षा करती हैं, जो समस्त प्राणियों को देने वाली है, वह पृथ्वी हमारे लिए मधुर एवं प्रिय पदार्थों का दुग्ध प्रदान करे और हमें तेज, शक्ति तथा वैभव से अभिषिक्त करे।

“अस्वप्नाः” : जो कभी नहीं सोते

मंत्र का सबसे आकर्षक शब्द है— “अस्वप्नाः”

अर्थात् जो सोते नहीं, सदैव जागरूक रहते हैं।

वैदिक दृष्टि में यह शब्द देवताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है।

किन्तु दार्शनिक अर्थ में यह उन सार्वभौमिक शक्तियों का संकेत है जो निरन्तर कार्यरत रहती हैं।

आधुनिक विज्ञान में भी पृथ्वी की अनेक प्रणालियाँ बिना रुके कार्य करती रहती हैं—

  • गुरुत्वाकर्षण
  • जलचक्र
  • वायुमण्डलीय परिसंचरण
  • जैव-रासायनिक चक्र
  • पारिस्थितिक संतुलन

ये कभी सोते नहीं।

मनुष्य सो सकता है, किन्तु प्रकृति की प्रक्रियाएँ निरन्तर सक्रिय रहती हैं।

ऋषि का "अस्वप्ना" शब्द इस वैज्ञानिक तथ्य का अत्यंत काव्यात्मक रूप प्रतीत होता है।

“विश्वदानीम्” : सबको देने वाली पृथ्वी

मंत्र में पृथ्वी को कहा गया है— “विश्वदानीम्”

अर्थात् समस्त विश्व को देने वाली।

पृथ्वी बिना किसी भेदभाव के स,को देती है—

  • जल,वायु,अन्न,खनिज,वनस्पतियाँ,ऊर्जा

आधुनिक पारिस्थितिकी में पृथ्वी को "Life Support System" कहा जाता है क्योंकि समस्त जैविक जीवन का आधार वही है।

ऋषि हजारों वर्ष पहले इसी तथ्य को "विश्वदानी" शब्द में व्यक्त करते हैं।

“अप्रमादम्” : सतत सजग व्यवस्था

मंत्र का एक और महत्वपूर्ण शब्द है— “अप्रमादम्”

अर्थात् जिसमें प्रमाद नहीं है, जो निरन्तर सतर्क है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पृथ्वी पर अनेक स्व-संतुलनकारी प्रक्रियाएँ (Feedback Mechanisms) कार्य करती हैं।

उदाहरणार्थ— कार्बन चक्र,ऑक्सीजन चक्र,नाइट्रोजन चक्र,जलचक्र

ये प्रणालियाँ पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक संतुलन बनाए रखती हैं।

आज पृथ्वी-विज्ञान में इसे Homeostasis of Earth Systems कहा जाता है।

ऋषि इस सतत संतुलनकारी शक्ति को "अप्रमाद" के रूप में देखते हैं।

पृथ्वी का दुग्ध : संसाधनों का प्रतीक

मंत्र में प्रार्थना की गई है— “सा नो मधु प्रियं दुहाम्”

यह पृथ्वी हमारे लिए मधुर और प्रिय पदार्थों का दुग्ध प्रदान करे।

वैदिक साहित्य में "दुहाम्" (दूध दुहना) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है।

यहाँ इसका अर्थ गाय के दूध तक सीमित नहीं है।

पृथ्वी का दुग्ध है— अन्न,फल,औषधियाँ,जल,वनसम्पदा,खनिज

अर्थात् पृथ्वी अपने संसाधनों द्वारा जीवन का पोषण करती है।

“मधु” : पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक

वैदिक साहित्य में "मधु" का अर्थ केवल शहद नहीं है।

यहाँ मधु का अर्थ है— कल्याण,पोषण,मधुरता,जीवनोपयोगिता

आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की भाषा में इसे "Ecosystem Services" कहा जा सकता है।

प्रकृति हमें—

  • स्वच्छ जल देती है,
  • स्वच्छ वायु देती है,
  • खाद्य पदार्थ देती है,
  • जलवायु को संतुलित रखती है।

यही पृथ्वी का "मधु" है।

“उक्षतु वर्चसा” : तेज और जीवन-शक्ति

मंत्र के अंतिम शब्द हैं— “उक्षतु वर्चसा”

अर्थात् वह हमें वर्चस् (तेज, शक्ति, ओज, ज्ञान) से अभिसिंचित करे।

यहाँ वर्चस् केवल शारीरिक शक्ति नहीं है।

वैदिक परम्परा में वर्चस् का अर्थ है— बौद्धिक तेज,नैतिक शक्ति,आध्यात्मिक प्रकाश,सामाजिक प्रतिष्ठा

आधुनिक संदर्भ में कहें तो पृथ्वी का स्वास्थ्य और मानव का स्वास्थ्य परस्पर जुड़े हुए हैं।

स्वस्थ पर्यावरण से— स्वस्थ शरीर, स्वस्थ समाज,स्वस्थ विचारउत्पन्न होते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक सन्दर्भ

यदि इस मंत्र को आधुनिक पृथ्वी-विज्ञान के आलोक में देखें तो यह कई महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करता है—

1. पृथ्वी एक स्व-नियंत्रित प्रणाली है -

पृथ्वी की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ निरन्तर संतुलन बनाए रखती हैं।

2. पृथ्वी जीवन का आधार है

वह समस्त जीवों को संसाधन प्रदान करती है।

3. संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है

यदि पृथ्वी का अति-दोहन होगा तो उसका "मधु" नष्ट हो जाएगा।

4. पर्यावरण और मानव-कल्याण जुड़े हुए हैं

पृथ्वी की समृद्धि ही मानव की समृद्धि है।दार्शनिक परिप्रेक्ष्य

इस मंत्र का गहन संदेश यह है कि पृथ्वी केवल बाह्य पदार्थ नहीं है।

वह एक ऐसी व्यवस्था है—

  • जो हमें पोषित करती है,
  • हमारी रक्षा करती है,
  • और हमें विकसित होने का अवसर देती है।

इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह पृथ्वी के प्रति कृतज्ञ रहे और उसके संतुलन को नष्ट न करे।

पृथ्वी सूक्त का सप्तम मंत्र पृथ्वी की संरक्षणकारी, पोषणकारी और जीवनदायिनी शक्ति का अद्भुत स्तवन है। "अस्वप्ना", "विश्वदानी", "अप्रमाद" और "मधु" जैसे शब्द पृथ्वी को एक जीवंत और सतत कार्यरत प्रणाली के रूप में चित्रित करते हैं। आधुनिक विज्ञान के आलोक में यह मंत्र पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन, प्राकृतिक चक्रों तथा जीवन-समर्थन प्रणाली की गहन समझ को प्रकट करता है।

यह मंत्र हमें सिखाता है कि पृथ्वी केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि एक ऐसी जागरूक व्यवस्था है जिसके संरक्षण पर सम्पूर्ण मानव सभ्यता का भविष्य निर्भर है।

समापन श्लोक

अस्वप्ना या जगद्धात्री विश्वदात्री निरन्तरा।
मधुधारा समृद्धिं च वर्चश्च प्रददातु नः॥

(यह व्याख्यात्मक श्लोक है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)

मुकेश ,,,,,,,

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