तुमने एक बीज बोया।
तुमने एक बीज बोया।
मिट्टी तैयार थी।
ऋतु अनुकूल थी।
जल भी पर्याप्त था।
फिर भी
अंकुर बाहर नहीं आया।
धरती ने उसे रोके रखा
कई दिनों तक।
शायद वह प्रतीक्षा कर रही थी
उस आवाज़ की
जो बीजों को विश्वास दिलाती है
कि अंधकार के बाहर
वास्तव में एक संसार है।
प्रेम अक्सर
उसी आवाज़ का दूसरा नाम है।
मुकेश ,,,,
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