यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्याः...— पृथ्वी सूक्त के चतुर्थ मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्याः...— पृथ्वी सूक्त के चतुर्थ मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का चतुर्थ मंत्र पृथ्वी की दिक्-व्यवस्था (Spatial Order), अन्नोत्पादन, तथा जीवन-धारण की क्षमता का अत्यंत सुंदर और गहन वर्णन प्रस्तुत करता है। यदि तृतीय मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी को समुद्रों, नदियों और कृषि की आधारभूमि के रूप में देखा था, तो इस मंत्र में वे पृथ्वी के वैश्विक विस्तार तथा उसकी जीवनदायिनी शक्ति की ओर संकेत करते हैं।
विशेष बात यह है कि इस मंत्र में पृथ्वी को किसी सीमित भूभाग के रूप में नहीं, बल्कि चारों दिशाओं में विस्तृत एक सार्वभौमिक सत्ता के रूप में देखा गया है। यह दृष्टि वैदिक ऋषियों की व्यापक भौगोलिक चेतना और विश्वबोध को प्रकट करती है।
मंत्र-पाठ
यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः।
या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु॥ ४॥
जिस पृथ्वी की चारों दिशाएँ विस्तृत हैं, जिस पर मनुष्यों के लिए अन्न उत्पन्न होता है, जो विविध प्रकार से समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करती है, वह पृथ्वी हमें गौ-संपदा तथा अन्न की समृद्धि प्रदान करे।
दिशाओं का वैदिक बोध
मंत्र का प्रारम्भ होता है— “यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्याः”
अर्थात् पृथ्वी की चारों दिशाएँ।
यहाँ "प्रदिशः" शब्द केवल पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण का संकेत नहीं करता, बल्कि पृथ्वी के समग्र विस्तार का बोध कराता है।
वैदिक ऋषियों के लिए दिशा केवल स्थान-निर्धारण का साधन नहीं थी; वह ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (Cosmic Order) का प्रतीक थी।
आधुनिक भूगोल में दिशाएँ—
- मानचित्र निर्माण,
- नौवहन (Navigation),
- खगोल विज्ञान,
- भू-स्थानिक अध्ययन (Geospatial Science)
की आधारशिला हैं।
यह तथ्य उल्लेखनीय है कि वैदिक साहित्य में दिशाओं का उल्लेख बार-बार मिलता है, जो प्राचीन भारतीयों की विकसित स्थानिक चेतना (Spatial Awareness) को दर्शाता है।
पृथ्वी का वैश्विक स्वरूप
इस मंत्र में पृथ्वी को किसी जाति, राष्ट्र या समुदाय की भूमि नहीं कहा गया है।
ऋषि सम्पूर्ण पृथ्वी की बात करते हैं।
यह दृष्टि आधुनिक "ग्लोबल सिविलाइज़ेशन" की अवधारणा से मेल खाती है।
आज उपग्रहों से प्राप्त पृथ्वी की छवि हमें यह बताती है कि पृथ्वी वास्तव में एक साझा गृह (Common Home) है।
वैदिक ऋषि भी इसी वैश्विक चेतना की ओर संकेत करते प्रतीत होते हैं।
अन्नोत्पादन और कृषि-विज्ञान
मंत्र का दूसरा चरण कहता है—
“यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः”
यहाँ पुनः कृषि और अन्न उत्पादन का उल्लेख मिलता है।
यह पुनरावृत्ति आकस्मिक नहीं है।
वास्तव में वैदिक चिंतन में अन्न को जीवन का आधार माना गया है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी पृथ्वी पर जीवन का सम्पूर्ण तंत्र सूर्य ऊर्जा, मिट्टी, जल और वनस्पतियों के माध्यम से चलने वाले खाद्य-चक्र पर आधारित है।
कृषि केवल भोजन उत्पादन नहीं है; वह सभ्यता के निर्माण का आधार है।
इतिहासकारों का मत है कि स्थायी कृषि के विकास ने ही नगरों, राज्यों और संस्कृति को जन्म दिया।
ऋषि इस मूल तथ्य को भलीभाँति समझते थे।
“या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत्” : जैव-विविधता का सिद्धान्त
यह मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पक्ष है।
"बहुधा" का अर्थ है—अनेक प्रकार से।
"प्राणदेजत्" अर्थात् प्राणधारी जीव।
ऋषि कह रहे हैं कि पृथ्वी अनेक प्रकार के जीवों का पालन करती है।
यहाँ केवल मनुष्य की बात नहीं है।
इसमें सम्मिलित हैं—
- पशु
- पक्षी
- कीट
- वनस्पतियाँ
- सूक्ष्मजीव
- मनुष्य
आधुनिक जीवविज्ञान में इसे Biodiversity (जैव-विविधता) कहा जाता है।
आज ज्ञात प्रजातियों की संख्या लाखों में है, और पृथ्वी उन सभी का आश्रय है।
ऋषि का "बहुधा" शब्द इस अद्भुत विविधता का अत्यंत सटीक वर्णन करता है।
पारिस्थितिकी की दृष्टि
आधुनिक पारिस्थितिकी बताती है कि पृथ्वी पर कोई भी जीव अकेला नहीं रह सकता।
एक साधारण खाद्य-श्रृंखला को देखें—
- घास
- शाकाहारी पशु
- मांसाहारी जीव
- अपघटक सूक्ष्मजीव
इन सबके बीच गहरा संबंध है।
यदि किसी एक स्तर को नष्ट कर दिया जाए तो पूरा तंत्र प्रभावित हो जाता है।
ऋषि पृथ्वी को इस सम्पूर्ण जीवन-जाल की धारक मानते हैं।
यह दृष्टि आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक पारिस्थितिकी के निकट है।
गौ का उल्लेख : वैदिक अर्थ
मंत्र के अन्त में प्रार्थना है—
“सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु”
यह पृथ्वी हमें गौ-संपदा और अन्न प्रदान करे।
यहाँ "गो" का अर्थ केवल पशु के रूप में गाय नहीं है।
वैदिक साहित्य में "गो" के अनेक अर्थ हैं—
- गाय
- पशुधन
- पोषण
- समृद्धि
- प्रकाश
वैदिक कृषि-व्यवस्था में गौ आर्थिक जीवन का केन्द्र थी।
वह—
- कृषि में सहायक थी,
- दुग्ध प्रदान करती थी,
- जैविक खाद का स्रोत थी,
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार थी।
इसलिए "गो" का उल्लेख वास्तव में सतत कृषि व्यवस्था (Sustainable Agrarian Economy) का संकेत है।
आधुनिक सन्दर्भ
यदि इस मंत्र को वर्तमान युग में पढ़ा जाए तो यह निम्न संदेश देता है—
- पृथ्वी सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर है।
- खाद्य सुरक्षा पृथ्वी के संरक्षण से जुड़ी है।
- जैव-विविधता का संरक्षण आवश्यक है।
- पशुधन और कृषि एक-दूसरे के पूरक हैं।
- पृथ्वी के संसाधनों का उपयोग संतुलित और टिकाऊ होना चाहिए।
आज जब भूमि क्षरण, जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के संकट बढ़ रहे हैं, तब यह मंत्र और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
पृथ्वी सूक्त का चतुर्थ मंत्र पृथ्वी को चारों दिशाओं में विस्तृत, अन्नोत्पादक और समस्त प्राणियों की पालनकर्त्री शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें भौगोलिक विस्तार, कृषि-विज्ञान, जैव-विविधता और सतत जीवन-व्यवस्था का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह मंत्र हमें बताता है कि पृथ्वी केवल भूमि नहीं, बल्कि एक जटिल जीवंत तंत्र है जो असंख्य जीवों का पोषण करती है। अन्न, पशुधन और जीवन की समृद्धि उसी के संरक्षण पर निर्भर है।
इस प्रकार यह मंत्र पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और जैविक सहअस्तित्व का एक प्राचीन वैदिक घोष है।
समापन श्लोक
चतस्रो दिशो यत्र धरा प्रसृता,
यत्रान्नधारा सततं प्रवृत्ता।
प्राणैर्बहुभिर्भूषिता जगन्माता,
सा नः समृद्धिं दिशतु प्रसन्ना॥
(यह व्याख्यात्मक रचना है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)
मुकेश ,,,,,,,
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