शब्दयात्री : निहारिकाएँ

 शब्दयात्री : निहारिकाएँ

कुछ चीज़ें जितनी दूर होती हैं, उतनी ही अधिक अपनी लगती हैं।

निहारिकाएँ भी उन्हीं में से हैं।

रात के आकाश में वे स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। उन्हें देखने के लिए आँखों से अधिक धैर्य चाहिए। वे किसी तारे की तरह चमकती नहीं, किसी चाँद की तरह आकर्षित नहीं करतीं। वे बस दूर कहीं प्रकाश और धूल का एक स्वप्न बनकर ठहरी रहती हैं।

मैं अक्सर सोचता हूँ कि स्मृतियाँ भी निहारिकाओं जैसी होती हैं।

जब वे नई होती हैं, तब तारे होती हैं—चमकीली, स्पष्ट, तीखी। उनका हर विवरण दिखाई देता है। एक आवाज़, एक चेहरा, एक हँसी, एक शब्द—सब कुछ।

लेकिन समय बीतता है।

वर्ष अपने पाँव रखकर गुज़र जाते हैं।

और फिर स्मृति का तारा धीरे-धीरे निहारिका बनने लगता है।

चेहरा धुँधला पड़ जाता है।

आवाज़ का लहजा खो जाता है।

शब्द याद नहीं रहते।

केवल एक उजला-सा विस्तार बचता है।

एक एहसास।

एक आभा।

एक ऐसी मौजूदगी जिसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

वह भी अब मेरे भीतर किसी निहारिका की तरह रहती है।

कभी मैं उसकी आँखों को याद करने की कोशिश करता हूँ और असफल हो जाता हूँ।

कभी उसकी आवाज़ को पकड़ना चाहता हूँ, लेकिन वह उँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल जाती है।

मगर उसके होने का एहसास—

वह अब भी वैसा ही है।

शायद पहले से भी अधिक।

तब मुझे लगता है कि प्रेम का अन्त विस्मृति नहीं है।

उसका अन्त रूपान्तरण है।

वह व्यक्ति से प्रकाश बन जाता है।

चेहरे से आभा बन जाता है।

और स्मृति से एक निहारिका।

जिसमें असंख्य अनकहे क्षण, अधूरी बातें, खोई हुई दोपहरें और चुपचाप गुज़र गई शामें एक साथ घुल जाती हैं।

खगोलशास्त्री कहते हैं कि निहारिकाओं से तारे जन्म लेते हैं।

मैं सोचता हूँ, मनुष्य के भीतर भी कुछ निहारिकाएँ होती हैं, जहाँ से नए अर्थ जन्म लेते हैं।

वहीं से धैर्य आता है।

वहीं से करुणा।

वहीं से वह अजीब-सी समझ, जो केवल खो देने के बाद प्राप्त होती है।

शायद इसीलिए मैं उसकी स्मृति को वापस तारा नहीं बनाना चाहता।

मैं उसे वैसा ही रहने देना चाहता हूँ—

धुँधला।

विराट।

अपरिभाषित।

क्योंकि तारे सीमित होते हैं।

निहारिकाएँ नहीं।

उनके भीतर असंख्य सम्भावनाएँ सोती हैं।

असंख्य रोशनियाँ जन्म लेने की प्रतीक्षा करती हैं।

आज रात मैं आकाश की ओर देखता हूँ।

तारे अपने-अपने स्थान पर हैं।

चाँद भी है।

लेकिन मेरी दृष्टि उन पर नहीं ठहरती।

मैं उन धुँधले उजालों को देखता हूँ जो स्पष्ट नहीं हैं।

जो आकार नहीं माँगते।

जो केवल उपस्थित रहते हैं।

और मुझे लगता है कि मेरे भीतर भी एक निहारिका बह रही है—

उसके जाने के बाद बची हुई।

उसके होने के बाद जन्मी हुई।

उसके न होने के बाद भी प्रकाशित।

वहीं कहीं मेरी अधूरी मोहब्बत के कण तैर रहे हैं।

वहीं कुछ अनलिखे ख़त अब भी घूम रहे हैं।

वहीं कुछ प्रश्न बिना उत्तर के चमक रहे हैं।

और शायद वहीं,

किसी बहुत दूर के भविष्य में,

मेरी किसी नई समझ का पहला तारा जन्म लेने वाला है।

— मुकेश

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