शब्दयात्री : कृष्ण विवर

 शब्दयात्री : कृष्ण विवर

बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा कि उसके जाने के बाद मेरे भीतर एक रिक्तता पैदा हुई है।

फिर एक दिन समझ में आया कि वह रिक्तता नहीं थी।

वह एक कृष्ण विवर था।

एक ऐसा मौन, जो केवल खाली नहीं होता, बल्कि अपने आसपास की हर चीज़ को अपनी ओर खींचता रहता है।

पहले-पहल उसने मेरी हँसी को निगला।

फिर मेरी नींदों को।

फिर मेरे दिनों की सहजता को।

और धीरे-धीरे उन रास्तों को भी, जिन पर चलकर मैं कभी अपने आप तक पहुँच जाया करता था।

मैं उससे लड़ता रहा।

हर मनुष्य लड़ता है।

कौन चाहेगा कि उसके भीतर कोई ऐसा अन्धकार जन्म ले, जिसकी तह तक कोई प्रकाश न पहुँच सके?

लेकिन वक़्त ने मुझे एक विचित्र बात सिखाई।

खगोलविद कहते हैं कि कृष्ण विवर केवल विनाश की कहानी नहीं हैं। उनके चारों ओर प्रकाश के अद्भुत वलय बनते हैं। उनके गुरुत्वाकर्षण के कारण दूर-दूर के तारे अपनी दिशा बदल लेते हैं। वे केवल निगलते नहीं, ब्रह्माण्ड की संरचना को भी प्रभावित करते हैं।

शायद दुःख भी ऐसा ही होता है।

वह केवल छीनता नहीं।

वह हमें बदलता भी है।

उसके जाने के बाद मेरे भीतर जो कृष्ण विवर बना, उसने बहुत कुछ अपने भीतर समेट लिया। मेरा पुराना अहंकार। मेरी बालसुलभ निश्चितताएँ। यह भ्रम कि जीवन मेरे हिसाब से चलेगा। यह विश्वास कि हर प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।

सब कुछ धीरे-धीरे उसमें समाता चला गया।

और जब बहुत कुछ डूब गया, तब पहली बार मुझे अपने भीतर के आकाश का आकार दिखाई दिया।

पहले मैं प्रेम को एक तारे की तरह समझता था।

फिर उसे निहारिका की तरह देखा।

अब कभी-कभी लगता है कि वह एक कृष्ण विवर भी था।

न इसलिए कि उसने मुझसे कुछ छीन लिया।

बल्कि इसलिए कि उसके जाने के बाद जो अन्धकार पैदा हुआ, उसने मेरे भीतर की समूची आकाश-रचना को बदल दिया।

आज भी कुछ स्मृतियाँ उस अन्धकार के किनारे पर परिक्रमा करती रहती हैं।

एक मुस्कान।

एक शाम।

एक अधूरा वाक्य।

एक विदा जो कभी बोली नहीं गई।

वे सब उस घटना-क्षितिज के पास घूमते रहते हैं, जहाँ से लौटना सम्भव नहीं।

लेकिन अब मुझे उनसे भय नहीं लगता।

क्योंकि मैं जान गया हूँ कि हर अन्धकार शत्रु नहीं होता।

कुछ अन्धकार गर्भ की तरह होते हैं।

वे अपने भीतर कुछ नया रचते हैं।

वे हमें तोड़ते नहीं, पुनर्गठित करते हैं।

रात बहुत गहरी है।

आकाश में असंख्य तारे चमक रहे हैं।

लेकिन मेरी दृष्टि उन पर नहीं ठहरती।

मैं उस अदृश्य बिन्दु की ओर देखता हूँ जिसे देखा नहीं जा सकता, केवल उसके प्रभाव से पहचाना जा सकता है।

ठीक वैसे ही जैसे उसकी अनुपस्थिति।

मैं उसे देख नहीं सकता।

उसे छू नहीं सकता।

उसे पुकार नहीं सकता।

लेकिन मेरे भीतर जो कुछ हूँ, उसमें उसका प्रभाव अब भी मौजूद है।

और तब मुझे लगता है—

शायद मनुष्य की रूह में भी कुछ कृष्ण विवर होते हैं।

वे किसी व्यक्ति के चले जाने से जन्म लेते हैं।

फिर धीरे-धीरे हमारी पुरानी दुनिया को अपने भीतर समेट लेते हैं।

और बहुत वर्षों बाद,

जब हम उस अन्धकार से डरना छोड़ देते हैं,

तब पता चलता है कि उसी ने हमें एक नया आकाश दिया है।

एक ऐसा आकाश,

जो पहले से अधिक गहरा है,

अधिक विशाल है,

और अधिक सत्य।

— मुकेश

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