शब्दयात्री : दीपस्तम्भ
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शब्दयात्री : दीपस्तम्भ
कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं समन्दर में नहीं, धुँध में सफ़र कर रहा हूँ।
चारों ओर सफ़ेद ख़ामोशी फैली रहती है। इतनी घनी कि लहरों की आवाज़ भी जैसे अपने ही भीतर लौट आती है। ऐसे में दिशा का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम—सब एक ही धुँधले रंग में घुल जाते हैं।
जीवन में भी कुछ बरस ऐसे ही होते हैं।
हम चलते रहते हैं, पर यह नहीं जानते कि कहाँ जा रहे हैं।
हम जागते रहते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि किस उम्मीद के सहारे।
हम साँस लेते रहते हैं, पर भीतर कहीं कोई हिस्सा धीरे-धीरे नींद में डूबता जाता है।
उसके जाने के बाद मेरे जीवन में भी एक लम्बी धुँध उतरी थी।
मैंने बहुत दिनों तक उसे तन्हाई समझा।
फिर एक दिन मालूम हुआ कि वह तन्हाई नहीं, दिशाहीनता थी।
आदमी अकेले रह सकता है।
लेकिन बिना दिशा के नहीं।
उस वक़्त मुझे उसकी याद किसी चेहरे की तरह नहीं आती थी। न उसकी आँखें याद आती थीं, न उसकी आवाज़, न उसके शब्द। अजीब बात यह है कि स्मृति का सबसे टिकाऊ हिस्सा चेहरा नहीं होता।
वह एक उजाला होता है।
एक बहुत महीन उजाला।
दूर कहीं खड़ा हुआ।
जैसे किसी वीरान समुद्री किनारे पर बना कोई दीपस्तम्भ।
वह दीपस्तम्भ जहाज़ को अपने पास नहीं बुलाता।
वह उसे रोकता भी नहीं।
वह केवल इतना करता है कि अँधेरे में अपनी लौ जलाए रखता है।
बाक़ी सफ़र जहाज़ को ख़ुद करना होता है।
धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि वह मेरी ज़िन्दगी का दीपस्तम्भ थी।
वह मेरे साथ नहीं चली।
उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।
उसने मुझे कोई नक़्शा भी नहीं दिया।
लेकिन उसके साथ बिताए हुए कुछ उजले लम्हे दूर खड़े उस दीपस्तम्भ की तरह मेरे भीतर जलते रहे।
जब भी धुँध बहुत घनी हो जाती, मैं उसी उजाले को देखता।
जब भी भीतर का समन्दर बेचैन होता, मैं उसी लौ की ओर नज़र उठा देता।
और हर बार लगता कि अभी सब कुछ खोया नहीं है।
अभी रास्ता बाक़ी है।
अभी सफ़र जारी है।
आज इतने बरस बाद मैं यह नहीं कह सकता कि मैं उससे प्रेम करता हूँ या उसकी स्मृति से।
शायद दोनों में अब कोई फ़र्क़ नहीं बचा।
क्योंकि व्यक्ति वक़्त के साथ धुँधला पड़ जाता है, पर उसके कारण हमारे भीतर जो उजाला पैदा हुआ था, वह बना रहता है।
मैं उसी उजाले का यात्री हूँ।
धुँध अब भी आती है।
रातें अब भी लम्बी होती हैं।
समन्दर अब भी बेकिनारा है।
लेकिन दूर कहीं वह दीपस्तम्भ अब भी जल रहा है।
और मुझे लगता है कि मनुष्य को जीवन में बहुत कुछ नहीं चाहिए।
बस इतना कि कहीं कोई छोटा-सा उजाला हो,
जिसे देखकर वह अपने अँधेरों से गुज़र सके।
शायद मोहब्बत का अन्तिम अर्थ भी यही है
किसी के जीवन में घर बन जाना नहीं,
दीपस्तम्भ बन जाना।
दूर।
अप्राप्य।
मौन।
फिर भी मार्गदर्शक।
और जब कभी मेरी यह कश्ती अन्तिम बार किसी अनजाने साहिल की ओर बढ़ेगी, मुझे यक़ीन है कि उस आख़िरी धुँध में भी मैं उसी उजाले को खोजूँगा।
क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में साथ रहने के लिए नहीं आते।
वे केवल इतना सिखाने आते हैं कि अँधेरे में रौशनी कैसी दिखाई देती है।
— मुकेश
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