शब्दयात्री : अन्तर्ध्वनि
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शब्दयात्री : अन्तर्ध्वनि
उस रात के बाद मैंने उसकी याद को बुलाना लगभग छोड़ दिया। पहले मैं जान-बूझकर उन गलियों में जाता था जहाँ स्मृतियाँ रहती थीं। पुराने गीत सुनता, पुरानी शामों को याद करता, अधूरे वाक्यों को मन में दोहराता। अब ऐसा कम होने लगा है। स्मृति ने जैसे अपना घर बदल लिया हो। वह बाहर की चीज़ नहीं रही, भीतर की ध्वनि बन गई।
कभी-कभी प्रातःकाल ध्यान में बैठते हुए ऐसा लगता है जैसे हृदय के बहुत भीतर कोई सूक्ष्म नाद उठ रहा हो। वह शब्द नहीं है, पर मौन भी नहीं। उसमें किसी का नाम नहीं, पर एक परिचित आभा है। मैं उसे सुनता हूँ तो मुझे उसकी याद नहीं आती; मुझे अपने भीतर का वह भाग याद आता है जो उसके कारण जागा था।
यही शायद प्रेम का सबसे गहरा रूप है—जब वह किसी व्यक्ति से हटकर चेतना की गुणवत्ता बन जाता है। तब प्रिय का चेहरा धुँधला पड़ सकता है, पर उसके कारण उत्पन्न हुई करुणा नहीं मिटती। उसकी आवाज़ भूल सकती है, पर उससे सीखी हुई सुनने की क्षमता बनी रहती है। उसका साथ समाप्त हो सकता है, पर उसके कारण भीतर खुला हुआ आकाश बन्द नहीं होता।
मैं अब भी वक़्त के समन्दर में यात्रा कर रहा हूँ। कश्ती वही है, पाल वही, स्मृतियों का साज़ो-सामान भी वही। फर्क़ इतना है कि पहले मैं हर लहर में उसका अक्स खोजता था; अब लहरों की ध्वनि सुनता हूँ। पहले मैं क्षितिज तक पहुँचना चाहता था; अब यात्रा के मौन को समझना चाहता हूँ।
कभी-कभी रात को डेक पर बैठा मैं दूर तक फैले अँधेरे को देखता हूँ। हवा नमक और नमी की गन्ध लेकर आती है। आकाशगंगा सिर के ऊपर बहती रहती है। निहारिकाएँ अपने धुँधले प्रकाश में सोई रहती हैं। और उस सबके बीच मुझे महसूस होता है कि मेरी सबसे बड़ी बातचीत अब उससे नहीं, अपने आप से चल रही है।
उसने शायद यही दिया था—एक ऐसा दरवाज़ा जो बाहर नहीं, भीतर खुलता है।
अब यदि वह अचानक सामने आ जाए, तो शायद मैं उससे बहुत कम बातें करूँ। शिकायतें नहीं होंगी, प्रश्न नहीं होंगे, स्पष्टीकरण नहीं माँगूँगा। मैं केवल उसे देखूँगा और मन ही मन उस यात्रा को प्रणाम करूँगा जिसने मुझे मेरे ही भीतर तक पहुँचा दिया।
समन्दर अब भी अनन्त है। कश्ती अब भी चल रही है। पर अब मुझे दिशा बाहर के तारों से कम और भीतर उठती अन्तर्ध्वनि से अधिक मिलती है। वही मेरा कम्पास है, वही मेरा दीपस्तम्भ, वही मेरी प्रार्थना।
और उस अन्तर्ध्वनि में कहीं बहुत गहराई में एक कोमल-सा स्वर अब भी मौजूद है—न उसका नाम, न उसका चेहरा, केवल वह स्पर्श, जिसने मेरी रूह को एक बार जगाया था और फिर मौन में विलीन हो गया।
— मुकेश
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