शब्दयात्री : धूपघड़ी
शब्दयात्री : धूपघड़ी
मेरे भीतर एक धूपघड़ी है।
वह किसी पत्थर की नहीं बनी, फिर भी उतनी ही पुरानी लगती है।
जब मैं उसके पास बैठता हूँ तो मुझे अक्सर उन प्राचीन धूपघड़ियों का ख़याल आता है जिन्हें हमारे पुरखे समय जानने के लिए बनाया करते थे। उनमें कोई मशीन नहीं होती थी, कोई स्प्रिंग, कोई बैटरी, कोई टिक-टिक नहीं। बस एक सीधा-सा स्तम्भ या सूचक होता था, और सूर्य।
सूर्य चलता रहता था, और उसकी छाया पृथ्वी पर सरकती रहती थी। मनुष्य उस छाया को देखकर समय पढ़ता था।
मुझे यह बात हमेशा विस्मित करती है कि धूपघड़ी समय नहीं दिखाती, वह केवल छाया दिखाती है।
समय स्वयं कभी दिखाई नहीं देता।
वह अपनी छाया के माध्यम से ही समझ में आता है।
शायद इसी कारण मुझे धूपघड़ी से एक गहरा अपनापन महसूस होता है।
उसके जाने के बाद मैंने भी समय को सीधे नहीं देखा।
मैंने उसकी छाया देखी।
वह छाया मेरे दिनों पर पड़ी।
मेरी आदतों पर।
मेरे शब्दों पर।
मेरी ख़ामोशियों पर।
पहले मुझे लगता था कि मैं उसकी अनुपस्थिति में जी रहा हूँ।
अब लगता है कि मैं उसकी छाया में जी रहा हूँ।
और छाया का अपना एक सौन्दर्य होता है।
धूपघड़ी का स्तम्भ जितना स्थिर रहता है, छाया उतनी ही गतिशील होती है। उसे देखकर हम समझते हैं कि सूर्य आगे बढ़ रहा है। जबकि सच यह है कि सूर्य नहीं, पृथ्वी घूम रही होती है।
जीवन भी ऐसा ही एक भ्रम है।
हम सोचते हैं कि वक़्त बदल गया।
लोग बदल गए।
रिश्ते बदल गए।
लेकिन कई बार बदलने वाला संसार नहीं, हमारा अपना अन्तर्जगत होता है।
मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि उसके जाने के बाद जो कुछ बदला, वह बाहर कम और भीतर अधिक था।
दुनिया वैसी ही रही।
सुबहें आती रहीं।
बारिशें होती रहीं।
पेड़ों पर पत्ते उगते और झरते रहे।
लेकिन मेरी रूह की धुरी थोड़ी-सी बदल गई थी।
और उसी परिवर्तन ने मेरी स्मृतियों की छाया को नया आकार दे दिया।
धूपघड़ी की एक और बात मुझे बहुत प्रिय लगती है।
वह रात में काम नहीं करती।
अँधेरे में उसकी सारी विद्या समाप्त हो जाती है।
उसे समय बताने के लिए प्रकाश चाहिए।
तब मुझे लगता है कि स्मृति भी धूपघड़ी जैसी है।
जब दुःख बहुत गहरा होता है, तब स्मृतियाँ दिखाई नहीं देतीं।
तब केवल अन्धकार दिखाई देता है।
लेकिन जैसे ही भीतर थोड़ा-सा प्रकाश लौटता है, स्मृति की छाया फिर उभर आती है।
और हम अपने जीवन का समय पढ़ने लगते हैं।
आज इतने वर्षों बाद उसकी याद मेरे भीतर किसी घाव की तरह नहीं रहती।
वह धूपघड़ी की उस लम्बी छाया की तरह है जो शाम के समय धरती पर दूर तक फैल जाती है।
छाया को देखकर कोई यह नहीं कहता कि सूर्य दुखी है।
वह तो केवल दिन के एक पड़ाव का संकेत होती है।
वैसे ही उसकी स्मृति अब मेरे भीतर किसी अभाव का नहीं, एक बीते हुए उजाले का संकेत है।
शाम ढल रही है।
मेरे भीतर की धूपघड़ी पर छाया धीरे-धीरे लम्बी होती जा रही है।
मैं उसे देखता हूँ और सोचता हूँ
मनुष्य अपने जीवन में प्रेम को नहीं सँभालता।
वह उसकी छाया को सँभालता है।
प्रेम तो कभी का बीत चुका होता है,
जैसे दोपहर का सूर्य।
लेकिन उसकी छाया बहुत देर तक हमारे भीतर चलती रहती है।
और शायद उसी छाया को पढ़ते-पढ़ते
हम एक दिन अपने समय का अर्थ समझने लगते हैं।
— मुकेश
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