अनुपस्थिति का गणित

 अनुपस्थिति का गणित

वह चला गया और दुनिया ने गणित सी बदल दी:
कुछ दूरीयों के बीच घाव-बिंदु पैदा हो गए,
कुछ समीकरणों में शून्य के स्थान पर कोई नाम लग गया,
और उससे भी गहरा 

एहसासों का बिंदु विभाजित हो गया।

कुछ मौसम बिना कारण भारी हो उठे,
कुछ गीत बीच में सांस थाम लेते,
और कुछ रास्ते अनजाने में दूरियाँ बढ़ा लेते 
जैसे किसी ने मानचित्र पर चुपके से रेखाएँ खिंची हों।

यह सबसे सटीक प्रमाण है: किसी की उपस्थिति की
सत्यता का पैमाना यह नहीं कि वह बोलता था,
बल्कि यह कि जब वह नहीं है तो सब कुछ सोच में पड़ जाता है।

मुकेश ,,,,

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