“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
कि जो राज़ मुहब्बत के आखों मे छुपा के रक्खे हैं तुमने
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कि जो राज़ मुहब्बत के आखों मे छुपा के रक्खे हैं तुमने
झुकी पलकें मत उठाना तुम्हारी आखें पढ़ लेगा ज़माना
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------
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