कोई ज़रूरी तो नहीं रोश



कोई ज़रूरी तो नहीं रोशनी खुद को जला के की जाए
चाँद से सीखे कोई देना, रोशनी ठंडी तासीर के साथ !

मुकेश इलाहाबादी ----------

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