एक मुसाफिर की डायरी से --------------
ज़िदंगी की दो तिहाई सड़क नाप आया। न जाने कितने जंगलात, खाई, खंदक और रेगिस्तान पार कर आया। लेकिन मंजिल के नाम पर महज कुछ सराय खाने या भटियार खाने मिले। जहां चंद लम्हात की सहूलियत और फिर रवानगी, न मिलने वाली मंजिल की। लिहाजा अब तो सारे अरमानों को कफ़न दे दिया है और सफ़र को ही मुक़ददर मान लिया है। अपने मुकददर को ही लिये दिये उन दिनों भी चल रहा था, कि राह में एक सरायखाने से इत्तिफाक हुआ। जिसकी बातें आज एक अर्से के बाद भी यादों की पगड़डी में मील के पत्थर सा ठुंकी हुयी हैं। बात उन दिनों की है जब यह षख्स जवान हुआ करता था। दिल में जोश व बदन में ताकत हुआ करती थी। चटटान को तोड़ने व नदियों को पार करने का हौसला हुआ करता था। लेकिन जिसका दिल बच्चों सा मासूम था। अंदाज मस्ती भरा था। वह अपने कधों तक झूलते बालों व अलमस्त फक्कडी अंदाज को लिये दिये एक दिन अपनी मुकम्मल मंजिल की तलाष में निकल पड़ा। भटकता रहा शहर दर षहर जंगल दर जंगल। उस दौरान न जाने कितने दरख्तों को अपना साया बनाया न जाने कितने पड़ावों पे रात गुजारी न जाने कितने खेत खलिहानों को रौंदा मगर कहीं कोई मंजर उसे रास न आता, उसे लगता...

nice
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