वे अकेले नहीं हैं

 


वे अकेले नहीं हैं
शहर मे
साथ है उनके
चिरई, चुनगुन और यह खाली आकाश

वे अकेले नहीं हैं
कतई, काम के वक़्त भी
साथ है उनके
छेनी, हथौड़ी, मशीनों की खातर पटर
और उनके साथ की दर्जनों उदास आखें

वे अकेले नहीं हैं
ख्यालों में भी
साथ है उनके
दिहाड़ी का हिसाब
या पी ऍफ़ व ग्रेचुटी का कैल्कुलेसन

वे अकेले नहीं हैं
दडबे नुमा घर में भी
साथ है उनके
चूल्हे पे खदबदाती दाल और
बेहद काली लम्बी रात

मुकेश इलाहाबादी ---------------------




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