रख के हथेली पे सूरज सोचता है



रख के हथेली पे सूरज सोचता है वो,सब कुछ सोख लेगा !!
उसे मालूम नहीं ये महबूब की आखें हैं कोई समंदर नहीं!!
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है