दिल गीली लकड़ी जलाते रहे


 
दिल गीली लकड़ी जलाते रहे
लपक उट्ठी नहीं धुंआते रहे
मुहब्बत की तो दिल से की,
बोझ गमे बेवफाई उठाते रहे
उनकी आखों की हया ऐसी
नज़र मिलाई तो शर्माते रहे
चाहा तो कई बार कि कह दूं
हर बार हम ही घबराते रहे
मुकेश इलाहाबादी ------------

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