हवा मुसलसल बहती रही


हवा मुसलसल बहती रही

बेहया ज़ुल्फ़ मचलती रही



आँचल पतंग सा उड़ता रहा

इधर बिजलियाँ गिरती रही



बेहद नाज़ुक से दिल पे मेरे

अदाओं की छूरी चलती रही 



ग़ज़ल उसके नाम की कहूँ

रख काँधे पे सर सुनती रही


मुकेश इलाहाबादी ------------

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