माज़ी का इक - इक धागा चुनता हूँ


माज़ी का इक - इक धागा चुनता हूँ
फिर यादों की झीनी चादर बुनता हूँ

तुम मुझको भूल गए हो लेकिन,पर 
मै हर शाम तुम्हारी ग़ज़लें सुनता हूँ

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

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