जिस्मो जॉ के क़रीब लगता है

जिस्मो जॉ के क़रीब लगता है
ग़म भी मुझे अज़ीज लगता है

इतनी नफरतें पायी हैं हमने कि
लफजे़ मुहब्बत अजीब लगता है
 
यूँ तो हर कोई दौलतमंद मिलेगा
दिलसे हर शख्श ग़रीब लगता है

चॉद बादल की बाहों मे छुप गया  
मुझको ये बादल रक़ीब लगता है

ये बेरुखी बेवफाई और तन्हाइयां
ये अंधेरा ही मेरा नसीब लगता है

मुकेश इलाहाबादी --------------------

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