प्रेम मे, तुमने चुना - मृत्यु

प्रेम मे,
तुमने चुना -  मृत्यु
मैने चुना - जीवन

मै हंसा
मैने कहा
जीवन है तो प्रेम है

तुम चुप रहीं
मुस्कुराई
बस
खिली फूल सा
महमहाई खुशबू बन
और मुरझा गई
जल्द ही
फिर फिर खिलने को
मरने को
प्रेम मे होने को

उधर मै भी खिला
खिला रहा युगों युगों तक
पत्थर बन
बिना खुशबू
बिना कोमलता
पछताता रहा तुम्हारी मूर्खता पे
खुश होता रहा
अपने मरे हुये जीवन पे

और खिलने न दिया एक भी
फूल अपने सीने पे
आने न दिया एक भी वसंत अपने ह्रदय पे
पर तुम
हजारों हजार बार
खिलती रही
मरती रहीं
महमहाती रही
और
अगर कभी मेरा पत्थर पन
देव बन
किसी देवालय मे स्थापित हुआ
तब भी मेरा पूजन अधूरा रहा
बिना पुष्प के
बिना तुम्हारे

मुकेश इलाहाबादी --------------

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