सुब्ह धुली धुली लगती है


सुब्ह धुली धुली लगती है
ओस  में  नहाई लगती है

गलियों से जब गुज़रे तू
सचमुच हिरनी लगती है

जब भी तू मुझपे हंसती है
तू  बेहद  प्यारी  लगती है

तेरी आँखें गंगा - जमना 
नदी  सी  बहती लगती है

जाने ऐसा क्या है गोरी तू
मुझको अपनी लगती है

मुकेश इलाहाबादी ------

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