तुम्हारी निर्मल हँसी


जी तो चाहता है
तुम्हारी निर्मल हँसी
की दूधिया धार को
अंजुरी में समेट
आचमन कर
मै भी हूँ जाऊँ
पावन
पवित्रतम
तुम्हारे
निश्छल प्रेम सा 
और महमहाऊं
तुम्हारे आस पास 
पूजा की
धूप सा

मुकेश इलाहाबादी -------

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