चाँद से बतियाना चाहता हूँ

मैं चाँद से
बतियाना चाहता  हूँ
उसे  छूना चाहता हूँ
आसमान से उतार के
हथेलियों के बीच
महसूसना चाहता हूँ
उसे गोल गोल
गेंद सा घूमना चाहता हूँ
और फिर
आसमान में उछल के
हथेलियों में कैद कर लेना चाहता हूँ
यहाँ तक कि
खुशी से उसे चूम लेना चाहता हूँ
पर -
चाँद है कि आसमान से उतरता ही नहीं
रोज़
बिना नागा
सूरज ढलते ही
आ टंगता है नीले से साँवले होते
आसमान में
और मुस्कुराता है
जी ललचवाता है
जैसे ही मैं
अपनी हथेलियों में
उसे पकड़ना चाहता हूँ
मुँह चिढ़ाता हुआ
बादलों में छुप जाता है
और फिर
बहुत देर तक छुपा रहता है
और मैं यहाँ
मुँह ढांप सो जाता हूँ
फिर से
सुबह के बाद
दोपहर और फिर
सांझ के इंतज़ार में
शायद चाँद के इंतज़ार में

मुकेश इलाहाबादी --------------

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