यादों की मुंडेर पे



आँख
खुलते ही
यादों की मुंडेर पे
चहचहाने लगती है
तुम्हारे नाम की चिड़िया
और फिर
दिन भर
फुर्र- फुर्र उड़ने के बाद
साँझ होते ही
अपने पंखो पे
चोंच रख के सो जाती है
एक बार फिर चहचहाने के लिए
सुबह होते ही यादों की मुंडेर पे
तुम्हारे नाम की चिड़िया

सुमी, के लिए

मुकेश इलाहाबादी -----

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