तमाम रस्ते थे मेरे ज़ानिब मगर

तमाम रस्ते थे मेरे ज़ानिब मगर
रुके थे राह में, तेरी खातिर  मगर

कि जाने कब ख्वाब में तू जा जाये
कुछ यही सोच, न सोये फिर मगर

जनता हूँ तेरी सोच में मैं हूँ ही नहीं
मेरी रग रग में शामिल है तू मगर

मुकेश इलाहाबादी ------------------

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