जैसे कोई मुझको आवाज़ देता है

जैसे कोई मुझको आवाज़ देता है
मुड़ के देखूँ तो कोई नहीं होता है
सोचता हूँ मैं भी बेवफा हो जाऊँ
दिल को जाने कौन रोक लेता है
कई बार मैंने उजाले को पकड़ा
पर मुट्ठी खोलूँ तो जुगनू होता है
मुकेश खुद से ख़ुद के आँसू पोंछ
किसको कौन तसल्ली देता है ?

मुकेश इलाहाबादी ---------------

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