चाँद मेरा दोस्त

मेरे
पास विरासत के नाम पे
ढेर सारी वर्जनाओं, सिद्धांतों की क़ैद के
बीच थोड़ा सा आकाश था
जिसे अक्सर एक छोटी सी खिड़की से झाँक लेता था
उसआकाश में
अक्सर मुझे काले, भूरे डरावने बादल ही मंडराते दीखते
लेकिन कभी कभी एक सलोना सा चाँद भी दिख जाता
चाँद कभी बादलों में छुप जाता तो कभी दिख जाता
यूँ तो चाँद मुस्कुराता ही लगता
लेकिन एक दिन गौर से देखने पे मुझे
चाँद की आँखों में भी एक उदासी नज़र आयी
मै चाँद को देख रहा था
चाँद भी मुझे देखने लगा
मै कुछ अन्यमनस्क हो रहा था
कि चाँद खिलखिला के कहने लगा ' क्या देख रहे हो?"
मैंने कहा 'कुछ नहीं'
चाँद 'कुछ तो है ,,,, बोलो बोलो बेहिचक बोलो,
तुम मुझे अपना दोस्त समझो'
मेरी हिम्मत बढ़ी --
और मैंने कहा ' कुछ नहीं देख रहा हूँ , तुम कितने सुंदर हो चाँद '
चाँद पहले तो हंसा फिर कहने लगा
' हूँ, सबको लगता तो ऐसा ही है, सबको मेरी सुंदरता तो दिखती है
पर मेरे चहेरे के दाग़ नहीं दीखते मेरे जिस्म के गड्ढे और दुखों के पहाड़ नहीं दीखते ?
बिन थके बिन रुके धरती का धरती का चक्कर लगाना नहीं दीखता?
राहू द्वारा डसा जाना नहीं दीखता,  
मेरी तनहाई नहीं दिखती
और हंसने लगा और चाँद आगे कहने लगा' खैर छोड़ो ,, तुम अपनी बताओ ,,
मै कुछ कहता इसके पहले चाँद को बादल ने ढँक लिया,
और मै उसका इंतज़ार करता रहा देर तक ,,

क्रमशः

मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

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