पाँव में ज़ंज़ीर नहीं बाँधी गयी है

पाँव में ज़ंज़ीर नहीं बाँधी गयी है
दौड़ने की इज़ाज़त भी नहीं दी है

सरदार जब मन की बात सुनाए
सिर्फ हुँकारी भरो बोलना नहीं है

पत्थर  की नाव पत्थर के केवट
पार जाना है और रेत् की नदी है

हम सतत विकास के रस्ते पे हैं
सिर्फ चलते रहो रुकना नहीं है

हमारी सिर्फ टाँगे सीधी मिलेंगी
बाकी रीढ़ व गर्दन दोनों झुकी है

मुकेश इलाहाबादी -------------

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